अरे! मैं लड़का नहीं, लड़की थी इसमे मेरा क्या दोष था...

Author: दिलीप /


फूलों के बिछौने पर नन्हे नन्हे हान्थो से मैं चढ़ी...
इत उत फिरती आसमान मे, थी मैं एक नन्ही सी परी...
जब मन करता हौले से कलियों मे जाके छिप जाती...
कभी दुबक के पत्तों के आँचल पे आराम से सो जाती...

एक दिन मैं सो रही थी, भगवान जी मेरे पास आए...
प्यार से मुझे देखा, जगाया और फिर दोनो मुस्काये...
बोले अब वक़्त आ गया है तुम्हे कहीं और जाना है...
अम्बर का दामन छोड़ किसी और का आँगन सजाना है...

मैने भी नाराज़ होके कहा मैं यहाँ से क्यूँ जाऊं...
किसी अंजान जगह के लिए अपना घर क्यूँ ठुकराऊं...
फिर उन्होने बताया, मुझे एक परिवार का अर्थ समझाया...
बोले कुछ वास्तविक प्रेम का आनंद ले छोड़ ये माया...

मैं भी सब सुन ललचा उठी, उनकी बातों मे आ गयी...
फिर नभ से उतर, मैं एक स्त्री की कोख मे समा गयी...
बहुत अंधेरा था वहाँ, बस बुरा बुरा सोच रही थी...
क्यूँ उनकी बातों मे आई, अपनी बुद्धि को कोस रही थी...

पर तभी दीवार पे कान लगाया तो मैने कुछ सुना...
सुन के लगा मेरी खातिर किसी ने है कोई सपना बुना...
कोई वो दीवार छूता, प्यारी सी छुअन का एहसास होता...
मन भी उस प्यार के साबुन से, सब पुरानी यादें धोता...

मैं सोचने लगी बाहर की दुनिया कितनी रंगीन होगी...
कुछ समय बाद वाली भावनाए कितनी नवीन होगी...
धीरे धीरे मैं भी ममता का अर्थ समझने लगी थी...
बाहर निकल माँ की गोद मे जाने को मचलने लगी थी....

सोच रही थी बाहर जाऊंगी तो माँ से लिपट जाऊंगी...
रो रो सताऊंगी, उनसे अपनी सब बातें मनावाऊंगी....
पिताजी का कंधा चढ़ संसार के सब स्वाद चखूँगी...
अब मैं भगवान जी को सदा, उन दोनों के बाद रखूँगी...

तभी अचानक एक दिन बाहर बहुत शोर सुनाई दिया...
माँ की चीखों मे जलता पिताजी का क्रोध दिखाई दिया...
बहुत प्रयास किया पर कुछ साफ नही सुन पा रही थी...
बस पिताजी के मुँह से लड़के लड़के की आवाज़ आ रही थी...

कुछ समझ पाती, कि मैं अंदर ही अंदर डोलने लगी...
जाने क्या हुआ, माँ भी बस बचाओ बचाओ बोलने लगी...
अब तक जिसने बिना देखे ही मुझे था इतना लाड़ दिया...
आज उन्ही पिताजी ने लड़के की चाह मे मुझे मार दिया....

वापस उपर गयी तो अब वो फूल मुझे नही जन्च रहे थे...
लगता था जैसे सब आज मेरे ही दुर्भाग्य पे हंस रहे थे...
भगवान जी से नाराज़ थी, मन मे पल रहा आक्रोश था...
अरे! मैं लड़का नहीं, लड़की थी इसमे मेरा क्या दोष था...

15 टिप्पणियाँ:

Tej Pratap Singh ने कहा…

kaya yaar kamaal ki sonch....bahut sahi...

M VERMA ने कहा…

सामाजिक सन्दर्भों पर लिखने से रचनाओं को आयाम मिलता है
आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं
यह रचना भी बेहतरीन रचना है

संजय भास्कर ने कहा…

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत जबरद्स्त तरीके से विषय प्रस्तुत किया है, बधाई

pukhraaj ने कहा…

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

काश बेटियों के बारे में लोग अपनी सोच बदले!!अच्छी रचना....

नवीन जोशी ने कहा…

bahut sundar abhivyakti. sundar kavita w chitra ka imagination bhee.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है ! दिल को छुं गई ! ये शर्म कि बात है कि आज भी हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो कन्या भ्रूण हत्या करते हैं या करवाते हैं ! ऐसे लोगों को सख्त सजा मिलनी चाहिए !

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने उम्दा रचना प्रस्तुत किया है! बधाई!

कविता रावत ने कहा…

काश कन्या भूर्ण हत्या करने वाले और बेटियों के प्रति अपनी कुंठित सोच के बाहर न निकलने
.....जागरूकता भरी प्रस्तुति के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ ..

Priya ने कहा…

betiyon ke baare mein aapki kavita aur khyaal dono hi dil ko bahut bhaye

दिलीप ने कहा…

ye achcha hai ki aaj samaaj me thodi jagrukta aayi hai...par wo shehron tak hi seemit hai...is chhoti si koshish ki sarahna ke liye aap sabhi mitron ka abhar...

nilesh mathur ने कहा…

सिर्फ एक शब्द ! बेहतरीन !

Viresh ने कहा…

आपकी अभिव्यक्ती बहुत सुन्दर है, मन को छू गयी. सामजिक विशयो पर और लिखे१

Viresh Singh

Viresh ने कहा…

आपकी अभिव्यक्ती बहुत सुन्दर है, मन को छू गयी. सामजिक विशयो पर और लिखे१

Viresh Singh

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