कुछ आख़िरी बातें........(भारत के वीर सैनिकों को समर्पित)

Author: दिलीप /


इस पहाड़ी ज़मीन को झुक के छूना कुछ नमी मिलेगी...
फिर आस पास कुछ महसूस करना किसी की कमी मिलेगी...
कभी खून की बहती लड़ियों से ये धरती थी दुल्हन सी सजी...
उनमे कुछ टूटी लडियाँ इसके माथे पे अब भी हैं बची...

इस ज़मीन के एक खामोश टुकड़े पे अब भी मेरा हक है...
मेरी सूखी सुर्ख लाल निशानी वहाँ मौजूद अब तलक है...
लहरते तिरंगे पे गौर से देखो कुछ खून की बूंदे है...
इस छाँव तले अब भी मेरे कितने साथी आँखें मून्दे हैं...

कितनी खामोश ज़ुबानें कितना कुछ कहने को बेताब है...
यादों की आग उन मुंदी आँखों मे अब तलक बेहिसाब है...
मुझे भी कुछ कहना है जो मैं कभी कह नहीं पाया...
कुछ लोग हैं जिनकी जुदाई मैं आज तक सह नहीं पाया...

बस उनको एक बार मेरा ये आख़िरी पयाम पहुँचा देना...
प्यार किसी को दूवायें तो किसी को सलाम पहुँचा देना...
बस इन हवाओं के संग संग बढ़ना ये सब बता देंगी...
किस राह से किस गली से गुज़रना है तुम्हे सारा पता देंगी...

इन्हीं के सहारे तो मैं चुपचाप वहाँ हो आता हूँ...
अपनी माँ बाबूजी और प्यारी सी बहेन को देख पाता हूँ...
जब उस गली पहुँचना तो रुकना एक पीले हरे मकान पे...
नीम मे फँसी पतंगें ताक रही होंगी आसमान में...

सुबह सुबह जाओगे तो देखना दरवाज़ा खुला ही मिलेगा...
उन दरवाज़ों की टेकरी सारा आँगन तुम्हे धुला ही मिलेगा...
कोई मूर्ति से बैठे होंगे वहाँ चारपाई पे चश्मा लगाए ...
कुछ बड़बड़ाते होंगे अख़बार के पन्नों मे मुँह छुपाए...

उनके पास जाना और चुपचाप छू उनके चरण लेना...
इसी बहाने से उनके इस दिल के टुकड़े का उन्हें नमन देना...
वो मेरे बाबूजी होंगे उनके हान्थ पल भर थाम लेना...
फिर कुछ इधर उधर की बातों के बाद मेरा नाम लेना...

चश्मे के पीछे बूढ़े आँसू बहें तो उनको बहने देना...
बहुत दिनों से खामोश हैं, उन्हे जी भर कहने देना...
बहते बहते जब थम जाए आँखों का वो पानी खारा...
कहते कहते रुक जाए तो देना उनके काँधे को सहारा...

फिर आराम से उनसे कहना जो मैं तुम्हे कह रहा हूँ..
मैं भी जाने कबसे उनसे ये असह जुदाई सह रहा हूँ...
कहना यूँ अपने लाल की शहादत को शर्मिंदा ना करें...
अपने आँसुओं से उन गोलियों का दर्द फिर ज़िंदा ना करें...

आपको ही देखते आपसे सीखते यूँ काबिल बन सका था...
कि दुश्मन की गोलियों के सामने बेखौफ़ तन सका था...
कहना की तेरे बहादुर बेटे ने कभी पीठ नही दिखाई...
सारी गोलियाँ मरते दम तक लड़के इस सीने पर ही खाई...

और कहना जब पहली गोली सीने को चीरती निकल गयी थी...
उनके सीने से लग जो ताक़त मुझे मिलती थी वही मिली थी...
मैं ज़ख्मी बढ़ता रहा देश के दुश्मन को मार भगाया...
फिर कुछ अंतिम साँसों के ज़ोर से वहाँ तिरंगा लहराया...

कहना अगर अब फिर रोएंगे तो मैं नाराज़ हो जवँगा...
ज़िंदगी से तो चला ही गया यादों से भी चला जवँगा...
और फिर कहना की अपना टूटा चश्मा कब बनवाएँगे...
क्या उसके लिए भी कोई पंडित जी से मुहूर्त निकलवाएँगे...

फिर देखना आँसुओं के संग वो धीरे से मुस्काएँगे...
फिर तुम्हारे लिए गुड़िया से चाय पानी मँगवाएँगे...
एक प्यारी नन्ही सी गुड़िया हाथों मे प्लेट लिए आएगी...
फिर गुम्सुम सी चुप चाप वो किसी कोने मे बैठ जाएगी...

कभी सब कहते थे इसकी ज़बान तो बहुत तेज चलती है...
मेरे जाने के बाद से ना कुछ कहती है ना हँसती है...
धीरे से उसके पास जाना और उसके बगल बैठ जाना...
फिर उसके सर पे हान्थ फेर उसे मेरी ये बातें सुनाना...

कहना जंग पे जाते जाते मैने जी भर उसे याद किया...
फिर उसकी भेजी राखी को चूम उसे कलाई पे बाँध लिया...
उस हाथ ने ही जाने कितने दुश्मनों को मार गिराया...
तेरी राखी की ताक़त से ही उन्हें सरहद के पार भगाया...

कहना मैं कहीं गया नही उपर पेड़ से उसे देखता हूँ...
कभी कभी उतरता भी हूँ छिप के उसके साथ खेलता हूँ..
पर वो जाने क्यूँ अब ढंग से कुछ खेलती नही मेरे साथ...
उसकी हँसी देखने को पेड़ पे बैठा तरसता हूँ दिन रात...

कहना कभी कभी पतंग उड़ाने छत पे जाया करे...
फिर उस नीम के पेड़ से उसे जानबूझ के फँसाया करे...
देखना मैं खुद उसे उस पेड़ पे चढ़ छुड़ा दूँगा...
फिर हवा बन उसे बहुत उपर आसमान मे उड़ा दूँगा..

फिर हम मिल के आसमान की सारी पतंगे काटेंगे...
जब बगल की भैंस ज़ोर से चिलाएगी तो उसे डान्टेगे...
लेकिन अगर वो फिर से नही हँसी तो मैं उससे रूठ जाऊँगा...
फिर राखी बंधाने किसी और के पास कहीं दूर जाऊँगा...

फिर शायद वो हँसे तो तुम उसके गालों को चूम लेना...
उसके संग संग मस्ती में मेरी तरफ से झूम लेना...
फिर उसके साथ तुम रसोई की तरफ अपने कदम बढ़ाना...
ध्यान रखना नंगे पैर हो के ही रसोई के अंदर जाना...

वहाँ कोई सूखी लकड़ियाँ चूल्हे मे फेंक रहा होगा...
गरम गरम फूली हुई रोटियाँ बेमन से सेंक रहा होगा...
धुएँ से निकले आँसुओं मे अपने आँसू छुपा रही होगी...
उसकी बेचैन आँखें अब भी उसके लाल को बुला रही होंगी...

तू पास जाना और धीरे से उसकी चरण धूल ले लेना...
मेरी भी श्रद्धा के कुछ फूल उस आँचल मे दे देना...
उस आँचल मे ही तो बचपन के सब खेल खेले हैं...
मेरी खुशी की खातिर उसने जाने कितने दुख झेले हैं..

मेरे ज़ख़्मों मे उसने अपनी ममता का मरहम रखा है...
उसकी गोद मे ही जिंदगी के सब मीठे फलों को चखा है...
मेरी छोटी सी भी बीमारी मे वो पागल सी हो जाती थी...
पर खुद की बीमारी मे भी हरदम काम करती जाती थी...

उसके पास जाना उससे कहना की पाने लाल को माफ़ कर दे...
अगर मन को कोई भी बात हो तुम्हें कहके दिल साफ कर ले...
कहना मैं भी चाहता था की बस उसकी खातिर जी सकूँ...
उसकी आँखों का हर आँसू निकलने से पहले ही पी सकूँ...

पर क्या करूँ उसी ने तो कहा था की मेरी दो मायें है...
वो दूसरी माँ भी मुझसे कई लाखों सपने सजाए है...
एक ही ज़िंदगी थी वो भी इतनी छोटी एक के लिए ही मर सका...
दूसरी के आँचल में ना चाह कर भी ढेर सा दुख और आँसू भर गया...

कहना जो कुछ आँसू मरते मरते बहे वो तेरी खातिर बहे...
अब और तुझसे ये तेरा नालायक बेटा कहे भी तो क्या कहे...
वादा करता हूँ की अगले जनम मे फिर तेरी गोद मे ही आऊंगा...
फिर से तुझे अपनी शैतानियों से खूब जी भर के सताऊँगा...

अगली बार जब आऊँगा तो तुझे छोड़ कहीं नहीं जाऊँगा...
तेरे आँचल की छाँव मे बैठ तेरे हान्थो से खाना खाऊंगा...
इस बार माफ़ करना मैं तेरे किए कुछ कर नही पाया..
क्या करूँ एक और माँ थी उसने था दर्द में मुझे बुलाया...

देखना वो तुझसे कहेगी की मुझसे तुम वापस जाकर कहना...
तुझ पर गर्व करते हैं तेरे बाबूजी तेरी माँ और प्यारी बहना...
इन आँसुओं का क्या है ये तो कभी भी यूँही निकल आते हैं...
पर तेरे जैसे बेटे किसी माँ को नसीब से ही मिल पाते हैं..

अगर आना ही है अगली बार तो फिर अपने किसी साथी को भी लाना...
और फिर से एक बार मेरे आँगन को दुल्हन की तरह सजाना..
मैं तुमको पूरी छूट दूँगी जो चाहे करना, मनमौजी बनना...
पर मुझसे वादा करो अगले जन्म मे बनना तो बस फ़ौजी बनना...

इतना कहेगी और फिर वो कहते कहते अचानक चुप हो जाएगी...
फिर यादों के किसी झरोखे मे धीरे धीरे खो जाएगी...
फिर उन पैरों की धूल को माथे से लगा अपने साथ ले आना...
मैं उनको छू सकूँ इसलिए उसे बाहर हवा मे बिखराना...

फिर तुम भी रोना नहीं अपने घर चुपचाप हंसते हुए जाना...
कुछ तुम्हारे साथी तुम्हारे लिए मर गये बस ये मत भुलाना...
तिरंगे के इन रंगों मे जाने कितनों का बलिदान छिपा है...
इनसे ही तो ये लहरता है मत समझना लहराती इसे हवा है...

4 टिप्पणियाँ:

Shekhar kumawat ने कहा…

फिर तुम भी रोना नहीं अपने घर चुपचाप हंसते हुए जाना...
कुछ तुम्हारे साथी तुम्हारे लिए मर गये बस ये मत भुलाना...

ye he dam

viro ki sat sat naman


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

Udan Tashtari ने कहा…

फिर तुम भी रोना नहीं अपने घर चुपचाप हंसते हुए जाना...
कुछ तुम्हारे साथी तुम्हारे लिए मर गये बस ये मत भुलाना...
तिरंगे के इन रंगों मे जाने कितनों का बलिदान छिपा है...
इनसे ही तो ये लहरता है मत समझना लहराती इसे हवा है.


-बिल्कुल सही कहा है आपने!

बेनामी ने कहा…

lajawaab---------kuchh kahne ke liye shabd nahi hai wahh

बेनामी ने कहा…

sanjeev srivastava33@yahoo.in
lajawaab---------kuchh kahne ke liye shabd nahi hai wahh----------------excellent dear is easy to think but difficult to make others think.u did the good job.

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