दुनिया के नक्शे मे अब पाक ना हो..........

Author: दिलीप /


बर्फ़ीली ठंडक मे जो गल रहा है...
न तन मन लुटाना जिसे खल रहा है...
जो हंस हंस के लड़ लड़ के मृत्यु से हारा...
मगर उँचा लहरा तिरंगा हमारा...

वो बलिदान उसका यूँ बर्बाद ना हो...
पड़ोसी से कोई भी अब बात ना हो...

सापों को करते नही है यूँ पाला...
सजाते नही घर मे मकड़ी का जाला...
राहु को फिर से ना अमृत पिलाओ...
आगों से उनकी भी बस्ती जलाओ...

अभी दिन है बाकी कहीं रात ना हो...
यूँ गीदड़ बुला के मुलाकात ना हो...

मुट्ठी भर आए हज़ारों को मारा...
है बसने से पहले बसेरा उजड़ा...
बचपन भी रोया जवानी भी सिसकी...
उगलती रही आग बंदूक उसकी...

कुछ करो उसके पौधे मे भी पात ना हो...
बिलखता रहे वो कोई साथ ना हो...

क्यूँ उनके ही गीतों को हम गा रहे हैं...
जो भारत के टुकड़े चबा खा रहे है...
वो सुधरेंगे क्या जिनका दिल तंग ही हो
खेलों का मतलब जहाँ जंग ही हो...

यहाँ पैर रखने की औकात ना हो...
अमन के ये इक तरफ़ा ज़ज्बात ना हो...

नपुंसक विचारों का उत्तर मिला है...
बम के धमाकों से भारत हिला है...
वो घर मे घुसा आबरू छीन डाली
पूजन को उसके सजाए हैं थाली...

करो कुछ के भारत ये नापाक ना हो...
दुनिया के नक्शे मे अब पाक ना हो...

3 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर ने कहा…

daleep ji jwaab nahi aapka..

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर ने कहा…

daleep bahi kabhi -2 humari taraf bhi aa jaya karo...

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