पगली…

Author: दिलीप /


कभी एक ख्वाब मे ये सब देखा था....फिर उसे एक कहानी के रूप मे गढ़ा...एक बार फिर से कविता का रूप दिया है...आपको कहानी का रूपांतरण है इसलिए थोड़ी बड़ी है....पर आपको पसंद आएगी...उम्मीद है मेरी तरह ये किस्सा आपको भी झकझोरे.....

चौराहे के बीच मे बरसों से खड़ा जंग लगा लैंपपोस्ट हूँ मैं,
अंधेरे से लड़ते लड़ते जो हार चुका उजाले का वो दोस्त हूँ मैं,
यूँ तो कहने को बहुत सी अनकही अनसुनी कहानियाँ मेरे पास है,
पर उनमे से एक कहानी मेरे अंतर्मन के लिए अब भी बहुत ख़ास है,

लोगों ने तो वक़्त के साथ उसे धीरे धीरे याद बना भुला दिया,
पर उसने अंजाने मे ही सही, पर मानवता के अस्तित्व को हिला दिया,
इस कहानी की नायिका की जवानी, भूख और ग़रीबी ने ठग ली थी,
वो बिखरे बाल वा फटे चीथड़ो में, समाज से लड़ती एक पगली थी,

वो कभी मेरे नीचे ही बैठती थी, उठती थी, सोया करती थी,
कभी आते जाते लोगों पे चिल्लाती, कभी खुद से बोला करती थी,
वहशी निगाहें अक्सर उसके अधखुले चीथड़ो को घूरा करती थी,
उसे कुछ देने के बहाने उसे नज़रों से ही छू लिया करती थी,

पर वो तो पगली थी, वो तो बस अपनी ही दुनिया मे खोई रहती थी,
कुछ मिला तो खाया, नही तो कीचड़ से काम चला लिया करती थी,
कुछ ऐसे भी लोग थे जो इंसानियत का मर्म अब भी समझते थे,
उसकी हालत पे तरस खाकर कभी उसकी मदद कर दिया करते थे,

कभी पोलीस के डंडे तो कभी लोगों से गालियाँ भी खाई थी,
कभी खुद की बदहवासी पर उसने लोगों की तालियाँ भी पाई थी,
परेशानी मे भी बस हँसती थी, खुशी मे भी वो खिलखिलती थी,
इसी हसी के सहारे हर मौसम वो उन्ही चीथड़ो मे सह जाती थी,

एक दिन वो खुद मे खोई, पता नही शायद कुछ गुनगुना रही थी,
अपनी उंगलियों से ज़मीन पर, जाने कौन सी तस्वीर बना रही थी,
तभी अचानक कोई आवाज़ उसे ख़यालो की दुनिया से खीच लाई,
उठ आगे बढ़ी, तो सामने इंसान की मजबूरी की एक तस्वीर आई,

कूड़े के एक ढेर मे काग़ज़ों मे लिपटा एक बच्चा रो रहा था,
अपनी बाहें उपर उठाए शायद माँ की गोद को तरस रहा था,
वो अपनी पलकें मून्दे भूख से तड़प कर बस बिलख रहा था,
धीरे धीरे उस पगली के मन मे अपने नन्हें पैर रख रहा था,

वो पगली उसकी बाहों की प्यास बुझा, उसे गोद मे ले झूमने लगी,
बार बार कभी उसके माथे कभी गालों को जी भर चूमने लगी,
एक पगली क्या जाने माँ क्या होती है,पर ममता का सागर उमड़ पड़ा,
ममता मन की हालत की मोहताज नही होती,उसे देख मैं समझ गया,

लगा कि जैसे सारा प्यार उस बच्चे के लिए ही बचा रखा था,
वो अब उसका एक प्यारा सा खिलौना बन उसकी गोद मे सज चुका था,
जिसकी आँखों मे कभी आँसू नही थे,अब वो उसके रोने पे रोती थी,
उसे सीने से चिपकाए इधर उधर फिरती फिर मेरे नीचे सोती थी,

कीचड़ मिट्टी वो सब कुछ जो खुद खाती थी उसे भी खिला देती थी,
फिर प्यार से उसे झुलाते झुलाते धीरे से बगल मे सुला लेती थी,
उसके चीथड़ो के छोटे से हिस्से पर अब उसका भी अधिकार था,
उस के लिए वो अब सब कुछ था, उसके लिए दिल मे बहुत प्यार था,

अब कहानी का वो मोड़ है जिसे सोच मेरी आँखें अब भी भर आती है,
एक दिन  किसी ने पूछ लिया की इस बच्चे को वो किस नाम से बुलाती है,
ऐसा सवाल था ये जिसे सुन वो पगली अचानक ख़यालों मे खो गयी,
फिर  बस उसके नाम के बारे मे सोचते सोचते चुपचाप सो गयी,

वो नाम शब्द शायद अब उसके दिलो दिमाग़ पर ही चढ़ चुका था,
रात करवटों मे निकल गयी, मुँह से बस नाम नाम निकल रहा था,
सुबह से ही उसकी साँसे तेज, माथे की शिकन बढ़ती जा रही थी,
वो निगाहें, पागल मन हर तरफ एक नाम ही तलाशती जा रही थी,

उधर समाज मे भी उसके मन जैसा घनघोर युद्ध शुरू हो गया,
हैवान नींद से जाग गया, इंसान कहीं दूर दुबक कर सो गया,
अमन, चैन, भाईचारा सब तस्वीर से धूल की तरह हट गया था,
इंसान फिर आज अचानक हिंदू मे और मुसलमान मे बँट गया था,

इधर शैतान मुँह खोल खड़ा था, उधर उस पगली का मुँह बंद था,
पर उसके मन मे अब भी नाम को लेकर चल रहा भारी द्वंद था,
शैतान अपने अलग अलग रूपों मे चौराहे की तरफ बढ़ रहा था,
सब शांत था बस इक शोर था जो उस पगली के मन मे पल रहा था,

जाने वो कौन सी घड़ी थी, मुझ पर एक आसमान टूट पड़ा था,
अचानक शैतान का एक रूप नंगी तलवार लिए सामने खड़ा था,
वो भी अंजाना ही था ना जाने उसे सूझा भी तो क्या सूझा,
उस वहशी पागल ने उस पगली से पूछा भी तो बस नाम ही पूछा,

पर वो तो खुद नाम को लेकर मान मे हो रहे युध मे हार रही थी,
बस एकटक कभी उस शैतान को कभी उसकी तलवार निहार रही थी,
हैवानियत इंसानियत से अपनी बरसो की जंग जीतने ही वाली थी,
वो तलवार उस अंजानी पगली माँ की ममता बस चीरने ही वाली थी,

पर आज शायद शैतान ने ही इक दूसरे शैतान को हरा दिया था,
त्रिशूलों की टंकार ने उसे तलवार वही पर छोड़ भगा दिया था,
पर शैतान का एक सवाल उस पगली के मान मे अब भी गूँज रहा था,
क्या तुम हिंदू हो? इस सवाल से पगली को शायद नाम मिल गया था,

वो युद्ध शायद थम चुका था जो उसके अंतर्मन मे चल रहा था,
उस पगली की ज़ुबान से अब बस हिंदू हिंदू नाम ही निकल रहा था,
वो खुश थी, मैं समझ गया नाम मिल जाने का ये गुमान है,
पर तभी त्रिशूलों की टोली ने पूछ लिया क्या वो मुसलमान है,

उन्होने उसकी ज़बान पे चढ़ा शब्द सुना और वो आगे चले गये,
पर जाते जाते उसकी ख़त्म जंग की राख मे चिंगारी देते गये,
पगली क्या समझती पागल वहशी धर्म के ठेकेदारों की भाषा,
वो फिर उसे वापस उसी अंतर्द्वंद मे छोड़ गये,तोड़ उसकी आशा,

वो पगली का पागल मन जिसमे पहले गूँज रहा बस नाम नाम था,
अब नाम की जगह उसके मन मे हिंदू था, तो कभी मुसलमान था,
अब वो उस बच्चे को गोद मे उपर उठा ज़ोर ज़ोर से झुला रही थी,
वो होंठों से कभी उसे हिंदू तो कभी मुसलमान बुला रही थी,

पर मान उसका अभी भी बस एक नाम के लिए ही जंग कर रहा था,
उस ठंड भरी रात मे भी, उसके बदन से पसीना निकल रहा था,
उसकी उंगलियाँ अब बच्चे के नन्हें बाजुओं पे ज़ोर से कस रही थी,
बच्चा दर्द से चीख रहा था, वो मन के दर्द से तड़प रही थी,

वो ये झंझावात सह ना सकी और वो ज्वालामुखी फूट ही पड़ा,
और उससे निकलता लावा बस कुछ चंद पलों मे ही सिमट गया,
ये वो पल था जब वो दुश्मन तलवार बन चुकी उसकी सहेली थी,
आँखों मे अंगारे, और होठों पे हिंदू मुसलमान की पहेली थी,

फिर इस धर्म पर होती पागल जंग को एक पागल मन ही जीत गया,
उस तलवार ने उस पगली की भोली ममता को टुकड़े टुकड़े कर दिया,
वो प्यासी तलवार अब उस अबोध के जिस्म पे लगातार चल रही थी,
पगली एक वार पे उसे हिंदू तो दूसरे पे मुसलमान कह रही थी,

अब बचा रो नही रहा था, चुप था, पर कई टुकड़ों मे पड़ा था,
उसका कोई हिस्सा मेरी गोद मे तो कोई दूर जाके सड़कों पे पड़ा था,
अब वो पगली हर टुकड़े से वो धर्म का सवाल पूछ थक चुकी थी,
एक एक टुकड़े को प्यार से समेट फिर से मेरी ही गोद मे सो चुकी थी,

सुबह उठी तो दिल के टुकड़े के टुकड़ों को, गोद मे छुपा हँसती रही,
कई दिनों तक बस ऐसे ही, कभी हिंदू कभी मुसलमान कहती रही,
लोग समझते रहे शायद बच्चा दंगों की भेंट चढ़ गया होगा,
सच ही था,पगली का क्या दोष, उस जंग से उसका मान थक गया होगा,

धीरे धीरे उसकी ज़िंदगी इसी नाम की कशमकश मे यूँ खो गयी,
कि कई दिनों से भूखी पयासी मेरी गोद मे सदा के लिए सो गयी,
उसकी खुली पथराई बुझी आँखों मे अब भी एक ही सवाल था,
मेरे उस प्यारे से खिलौने का नाम हिंदू था या मुसलमान था......

10 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह!! इसे तो अभी फिर से पढ़ना पड़ेगा. प्रथम पठन में तो गजब की लगी!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

पगली पुराण अच्छा रहा!
बधाई!

Suman ने कहा…

इस कहानी की नायिका की जवानी, भूख और ग़रीबी ने ठग ली थी,
वो बिखरे बाल वा फटे चीथड़ो में, समाज से लड़ती एक पगली थी.nice

Suman ने कहा…

उसकी खुली पथराई बुझी आँखों मे अब भी एक ही सवाल था,
मेरे उस प्यारे से खिलौने का नाम हिंदू था या मुसलमान था.nice

KAVITA RAWAT ने कहा…

Ek jeeti-jaagti dil mein gahari utarti tasveer....... Manviya samvedana ka bahut maarmik dhang se aapne prastut kiya hai...
Bahut badhai

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

इस कहानी की नायिका की जवानी, भूख और ग़रीबी ने ठग ली थी,
वो बिखरे बाल वा फटे चीथड़ो में, समाज से लड़ती एक पगली थी,

ओह ......

इसी हसी के सहारे हर मौसम वो उन्ही चीथड़ो मे सह जाती थी,
ममता मन की हालत की मोहताज नही होती,उसे देख मैं समझ गया,

निःशब्द हूँ ......

इंसान फिर आज अचानक हिंदू मे और मुसलमान मे बँट गया था,

न जाने ये जाति धर्म किसने बनाया .....

सुबह उठी तो दिल के टुकड़े के टुकड़ों को, गोद मे छुपा हँसती रही,
कई दिनों तक बस ऐसे ही, कभी हिंदू कभी मुसलमान कहती रही,

ओह बेहद दर्दनाक .......

उसकी खुली पथराई बुझी आँखों मे अब भी एक ही सवाल था,
मेरे उस प्यारे से खिलौने का नाम हिंदू था या मुसलमान था......
दिलीप जी क्या ये सच्ची घटना हैं ......??

कई बार ऐसी पगलियों को घूमते देखा है ....एक बार एक लघुकथा भी लिखी थी पगली पर .....आज आपकी पोस्ट ने फिर वो घटना याद करा दी ......!!



आपने बेहद दर्दनाक शब्दों में पिरोया इस कथा को .....!!

संजय भास्कर ने कहा…

आपने बेहद दर्दनाक शब्दों में पिरोया इस कथा को .....!!

दिलीप ने कहा…

ये सच घटना तो नही है हीर जी, पर इसे मैने होते देखा था, एक स्वप्ना मे उठा तो बहुत रोया...बस फिर ये कहानी लिखी..बाद मे इसे कविता का रूप दिया...सराहना के लिए धन्यवाद!!!!

Shekhar kumawat ने कहा…

YAAAAAAAAAA


shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

Archana ने कहा…

एक साथ न सही पर ...टुकडों मे देख चुकी हूँ ये घटनाएँ.......

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