बिस्कुट......

Author: दिलीप /

कल रोज़ की तरह घर जाने , दफ़्तर से मैं चला था...
बस के इंतेज़ार मे मैं वहीं चौराहे पे ही खड़ा था...
मेरे चेहरे पे सबकी तरह इंसान का मुखौटा था...
हैवान मेरे जिस्म के खोल मे छिपा हुआ बैठा था...

पीछे ही फटे हुए चीथड़ो मे बैठी हुई थी इक माँ...
उसका कंधा थामे, बिलख रहा था इक बचपन वहाँ...
शाम होने को थी, मौसम थोड़ा थोड़ा सर्द हो रहा था...
और बच्चे की चीखों से मेरे सर मे दर्द हो रहा था...

मुड़ के देखा तो उस माँ ने अपना आँचल खंगाला...
कोने की गाँठ मे बँधा, एक गोल सा बिस्कुट निकाला...
बिस्कुट देख, मासूम की सूखी नज़रें खिल गयी थी...
फिर बच्चा चुप हुआ तो मुझे भी शांति मिल गयी थी...

अचानक मेरे कानों का सुकून फिर से खोने लगा...
अब तो वो बच्चा पैर पटक पटक के रोने लगा...
देखा तो उसके मन का खिलौना उससे बिछड़ गया था...
वो बिस्कुट फिसल वहीं किनारे, नाली मे गिर गया था...

अब हम दोनो ने ही उस माँ की ओर बड़ी आस से देखा...
उसने भी अपने उस फटे आँचल को झाड़ झाड़ के देखा...
पर इस बार उस आँचल मे न गाँठ थी, न बिस्कुट...
बचपन की गीली आँखों से, ममता का दिल गया घुट...

फिर सोचा शायद कोई इंसान, इधर से गुज़रा होगा...
जिसने दया कर ग़रीब की झोली मे बिस्कुट दिया होगा...
बचपन मासूमियत से तुतला के बस बिस्कुट माँग रहा था...
कभी उस नाली, तो कभी माँ की ओर भाग रहा था...

फिर सोचा क्यूँ ना अपने शैतान को थोड़ा छुपा लूँ...
इस ग़रीब को कुछ दे, थोड़ा सा पुण्य ही कमा लूँ...
पास मे ही एक बिस्कुट की दुकान देख मुड़ा ही था...
मन कई दिन बाद इंसान के जज्बातों से जुड़ा ही था...

तभी मन थोड़ा सा झिझका और वहीं ठिठक गया...
"घर चलो और बना दूँगी" जब उस माँ ने ये कहा...
अपनी सोच पे तब मुझे मन ही मन हँसी आ गयी...
सोचने लगा अपनी ही अकल आज मुझे मुँह चिढ़ा गयी...

तभी उस बच्चे ने नाली से बिस्कुट निकाल ही लिया...
उसके हांतो पे रखे बिस्कुट ने मेरा मन हिला दिया...
वो बिस्कुट ग़रीब की मजबूरी के गीत का मुखड़ा था...
वो बिस्कुट, बिस्कुट नहीं बस मिट्टी का इक गोल टुकड़ा था...

कई परतों मे दबा इंसान आज आँखों से छलक पड़ा...
उस माँ की मजबूरी का इक हिस्सा भी ढ्लक गया...
फिर बस आई, भीड़ के धक्के मे मैं उस पर चढ़ गया...
पर मन तो कुछ पल के लिए बस वहीं था गड़ गया...

जब घर पहुँचा तो वो याद कुछ धुँधला गयी थी...
बहुत थक गया था मैं, अब भूख भी सता रही थी...
मैं चाय बना ही रहा था की सारी इच्छा मर गयी...
जब बगल मे डिब्बे मे पड़े बिस्कुटो पे नज़र गयी...

वो बिस्कुट एक माँ की मजबूरी की कहानी कह रहे थे...
रोकने की कोशिश की, पर आँसू थे कि बस बह रहे थे....
पर आँसू थे कि बस बह रहे थे....

7 टिप्पणियाँ:

Amitraghat ने कहा…

मार्मिक-संवेदशील कविता..........."

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

बहुत ही संवेदनशील रचना...!हमारे घरों में बच्चो को कितने सहज उपलब्ध होते है बिस्किट और ये भी तो बच्चे है,मन तो इनका भी मचलता होगा!!हाय रे गरीबी!!!!

anuradha srivastav ने कहा…

मर्मस्पर्शी कविता............

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

हाय रे गरीबी....। तू किसी के घर मत रहा कर। सच गरीबी से बड़ा दुश्मन कोई नही इस जहाँ में। और तो और जब कूडे में खाना निकाल कर कुछ बच्चे और आदमी खाते है तो दिल ......। खैर मर्मस्पर्शी रचना।

kase kahun?by kavita. ने कहा…

"घर चलो और बना दूँगी" जब उस माँ ने ये कहा...
ek pal ko to ulajha hi diya aapne,bahut marmik chitran.

dileep ने कहा…

Dhanyawad Mitron....

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

दिल को गहराई तक छू गयी

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