हमें क्या करना इस हिन्दुस्तान से , उजड़ने दो, अगर उजड़ रहा है...

Author: दिलीप /


जब भी कहीं गोली चलती है,
जिन पे गोली चलती है , उनके लिए तड़पते तड़पते उनका हिन्दुस्तान मरता है,
जिनके अपनों पर गोली चलती है, उनके लिए डरा सहमा नया हिन्दुस्तान बनता है,
बाकी के लिए क्या ग़ज़ब हो गया, ऐसे ही तो हमारा हिन्दुस्तान चलता है,

क्या बिगड़ जाता है हिन्दुस्तान का , कुछ एक सौ हज़ार के मर जाने से,
किसी और ज़मीन के टुकड़े पे, उस आतंक की गोली का अपना काम कर जाने से,
क्या लोग उस दिन भर पेट खाना नही खाते, वो जिन्हें किस्मत से मिल जाता है,
या उन्हे चैन की नींद नही आती, या कोई किसी क्लब, पार्टी मे नहीं जाता है, 

कुछ नही बदलता, सब कुछ वैसे ही चलता है जैसे कहीं कुछ हुआ ही नही,
किसी जवान, बच्चे या औरत की मौत ने भी किसी दिल को जैसे छुआ ही नही,
लोग टीवी पे समाचार भी नही सुनते, क्यूंकी उनके लिए तो ये रोज़ की बात है,
सोचते हैं सुबह होने दो सब फिर से सही हो जाएगा, अभी तो रात है,

देखते भी है, तो बीच मे अपनी सास बहू की कहानियाँ भी निपटाते है,
फिर हंसते है, खाते है, फिर बिना किसी अफ़सोस के जाके चैन से सो जाते है,
उन घरों का क्या जिसमे शायद अब कोई टीवी चलाने वाला भी नही बचा होगा,
जिसका कोई भाई, कोई माँ, कोई बाप वहीं कहीं ठंडी लाशों मे पड़ा होगा,

उस माँ के आँसुओं का क्या, जिसका बेटा कभी ऑफीस से लौट ना पाया हो,
जिसका लाल स्कूल से तो एक निकला हो, पर घर टुकड़ों मे पहुँच पाया हो,
उस बाप की लाचारी का क्या, जो अपने जवान बेटे की अरथी के बोझ तले दबा हो,
उन माँगों का क्या अभी सजी थी और अगले ही पल जिनका सब कुछ उजड़ गया हो,

उन कलाइयों का क्या जो अब आने वाले हर रक्षाबन्धन पर सूनी ही रहेंगी,
मासूम निगाहों का क्या जो अब खुद को थामने वाली उंगलियाँ तलाशती रहेंगी,
पर हमे क्या, हमने तो उनके क़र्ज़ की अपनी किश्तो मे से एक किश्त चुका दी,
आज तो बाहों पे काली पट्टियाँ बाँध ली, थोड़ी देर तक मोमबत्तियाँ जला ली,

अब तो इंतज़ार करेंगे एक साल बीतने का और अगली सालगिरह मनाने का,
नही तो कोई नयी सालगिरह मना सके, ऐसी किसी घटना के फिर से हो जाने का,
सरकार भी अपना काम कर रही है, उसने उनकी मौत की कीमत लगा दी है,
और उस कीमत को अपने अगले बजट मे, एक महत्वपूर्ण जगह भी दे दी है,

हमारा क्या जा रहा है, हम कुछ नही करेंगे, हमारा क्या बिगड़ रहा है,
हम तो मराठी हैं, या बिहारी हैं, या राजस्थानी हैं, या फिर कहीं और के,
हमें क्या करना इस हिन्दुस्तान से , उजड़ने दो, अगर उजड़ रहा है...

29 टिप्पणियाँ:

देव कुमार झा ने कहा…

हमारा क्या जा रहा है, हम कुछ नही करेंगे, हमारा क्या बिगड़ रहा है,
हम तो मराठी हैं, या बिहारी हैं, या राजस्थानी हैं, या फिर कहीं और के,
हमें क्या करना इस हिन्दुस्तान से , उजड़ने दो, अगर उजड़ रहा है..

बहुत सटीक लिखा है दिलीप भाई..

'उदय' ने कहा…

...अदभुत !!!

मो सम कौन ? ने कहा…

सरकार तो भाई पुनर्वास पैकेज भी देती है, जो मुख्यधारा में लौट आते हैं उन्हें। वोट तो चाहिये ही चाहियें।
सही कहा आपने, हम हिन्दुस्तानी होते तो हमें दर्द होता इसके उजड़ने का।

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

भगवान ने बनाई ही है अद्भुत दुनिया। यह तो पूरे भारतवर्ष के किसी कोने मे हुई घटना की बात है। अपने घर परिवार मे ही देखिये; जाने वाला चला जाता है। सामाजिक परम्पराओं की आड़ मे ही सही चाहे इसे कुरीतिया कहें श्राद्ध करता है, म्रृत्यु भोज कराता है, 2-3 शोकाकुल रहता है परिवार, यहां तक कि यदि पत्नी भी रोती है तो सिर्फ़ तेरह दिन, बाकी तो सब सामान्य्। कहने का तात्पर्य भगवान ने दुख भुला देने की असीम शक्ति दी है। हाँ साथ ही सह्र्दयता, सहिष्णुता, दयालुता के भी गुण दिये हैं। ज़रूरतमंदों के लिये मदद के लिये सदैव तत्पर रहना चाहिये।

Sonal Rastogi ने कहा…

ये दर्द अब आँखों से आंसू बन निकलता भी नहीं "बहुत बुरा हुआ " होकर रह जाता है ....
शायद हम पत्थर होते जा रहे है

kshama ने कहा…

Kuchh kahne ki halat me nahi..haan, dil tadap zaroor gaya..

दीपक 'मशाल' ने कहा…

एकदम कटुसत्य बयान कर दिया दिलीप..

nilesh mathur ने कहा…

अन्दर तक हिला दिया आपने, खुद पर ही शर्म आने लगी, सचमुच हमारे लिए ये सब कोई मायने नहीं रखता, असल में हमारा ज़मीर मर चुका है!

दिलीप ने कहा…

Surykant ji aapki baaton se poori tarah sehmat hun...aur uspar chalne ka bhi prayas karunga....

sanu shukla ने कहा…

अतिउत्तम,अदभुत पोस्ट...
अपने सचाई बयान की है वर्तमान परिस्थिति की...

आचार्य जी ने कहा…

मनव्याकुल।

ashok ने कहा…

priy dilip ji
aap isi tarah sarthak likhte rahiye meri shubh kamnain. ashok jamnani

Brajdeep Singh ने कहा…

bhaisaab main aapke vichaaro ko salam karta hun ,tal aur lay to koi bhi mila de lekin jo soch aapki kavita main jhalkti hain na vo vastvik jeevan ki hoti hain aap na past ki baat karte hain na future ki karte hain jo bhi likhte hain present main likhte hain ,ye cheej hi aapki kavita ko char chand lagaati hain ,aur bakai main kya sundar kavita thi ye ,kuch kavita aapke blog ki aisi hain jinhe padhne ke baad bhi baar baar padhne ka man karta hain ,ek aap jo kavita maa par likhte hain ,aisa lagta hain jaise maa ke pass baith kar likhte hain aur hume bhi usi aanchal main pahuncha dete hain
bahut sundar dilip ji ,kaafi kuch seekh raha hun aapse
dhanybaad aapka jo aapne blog par apni kavitao ko prakashit kiya

राजेन्द्र मीणा ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
राजेन्द्र मीणा ने कहा…

आपकी बात बिलकुल सही है, सोचने का विषय है ये ???? बहुत सोचा ....परन्तु कोई सटीक असरदार सुझाव नहीं आता ...ना ही इस समस्या का कोई पूरा इलाज है ..सारा दोष सरकार पर डाल दे ???....उचित नहीं है ,,,कुछ स्थानों पर ,,सुरक्षा बड़ाई जा सकती है ..जहाँ बहुत जरुरत हो ....परन्तु सभी स्थानों पर ऐसा संभव नहीं ,,,अधिक भीड़ -भरे इलाको पर हर किसी के सामान की तलाशी बैग खोल-खोल कर नहीं ली जा सकती ...आम जन को बहुत असुविधा होती है ....इसके बावजूद भी कई संवेदी स्थानों पर सुरक्षा पर्याप्त है ....६० फीसदी ( कोई पुख्ता आंकड़े नहीं , मात्र अनुमान ) जनता अत्यधिक सुरक्षा को ,,,गालियाँ ही देती है ....ऐसी स्थतियों में अगर कहीं कोई विस्फोट हो जाए ,,,तो घायल और मृतको को मुआवजे के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं bachta ,, अगर उन्हें कोई लम्बी योजना दे तो बदलती सरकारों में कहीं खो जायेगी ,,,रही बात पुलिस और आम जनता की ...आम जनता साहसी है ( कई प्रमाण है ) ..पुलिस भी अपना काम करती है ...कई बार वो भी शहीद होते है ,,,हाँ कुछ अवश्य भ्रस्ठ है ...पर जो भी हो ( पुलिस एक दिन काम करना बंद कर दे तो देश में प्रलय आ जाएगी ) ...देश का नागरिक जिस भी प्रदेश का हो एक भारतीय होने के नाते सबको अपना समझना चाहिए , अधिकांश समझते भी है ...जो ना समझे उनकी मरजी ,,देशद्रोही कह सकते है उन्हें ! ....विस्फोट जैसी घटनाएं भुला दी जाती है ,,,,सामान्य है ...समय के साथ सब कुछ स्वतः ही याद नहीं रहता ,,,/// ये मेरे अपने विचार है जो मैं आपसे कहना चाहता हूँ ,,,,कविता के बारे में कोई टिप्प्प्नी नही ...कविता तो मुख्यतः कल्पना और कुछ सच का संगम हो सकती है ...कल्पना स्वछंद है ...सच आपकी कविता में है ...बहुत अच्छी रचना है ,,,,आतंक होने की शुरुआत से अंत ( अंत ना कहे तो उचित ) होने तक सब कुछ सामने रख दिया है ,,,,यही होता रहा है ...दुर्भाग्य से होता भी रहेगा ...जब ऐसा कुछ देखते है तो खुद की बेबसी देख कर खुद का होना बेमानी लगता है ,,,,बहुत बेहतर लिखा है आपने ....बस एक विनती फिर से है हर विधा पर लिखे ,,,ख़ुशी होगी ,,,{ ये बड़ी-बड़ी टिप्पणी देखकर बोर मत होना ...रचना को देख कर तुरंत जो विचार आये वही लिखता जाता हूँ ..अगर ना आये तो एक बार फिर से पढता हूँ ,,,फिर भी ना आये तो ???????...इतनी ज्यादा बकवास पढने के लिए शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

बहुत सारगर्भित और व्यंग्यमय रचना
सुन्दर

sangeeta swarup ने कहा…

बहुत वेदना मयी....सोचने पर मजबूर करती , दिल दहला देने वाली स्थिति को बताती अच्छी रचना

दिलीप ने कहा…

@Rajendra ji yahi to main kehna chahta hun...hamein iski aadat nahi daalni...cheezein badalne ka prayas karna hoga ghatnaaon ko bhool jana samasya ka samadhaan nahi hai...uske baare me chintan karna hoga...nahi to sarkar yahi samajhti rahegi ki ham to bhool hi jayenge...aur sab filon me band ho khota rahega...

kunwarji's ने कहा…

"आज तो बाहों पे काली पट्टियाँ बाँध ली, थोड़ी देर तक मोमबत्तियाँ जला ली,
अब तो इंतज़ार करेंगे एक साल बीतने का और अगली सालगिरह मनाने का,"
दिलीप भाई

क्यों हमारी आत्मा के आराम में खलल डालने की नाकाम कोशिश किया करते हो....

क्या आप भी....कुछ प्रेक्टिकल बनो...कहाँ अब भी घिसे-पिटे ख्यालो में जिया करते हो....

कुंवर जी,

sada ने कहा…

ये हादसे हमें जिन्‍दगी को इन्‍हीं के साथ जीने को मजबूर करते हैं, कब किसके साथ कहां क्‍या होगा, इन सब बातों से अंजान हम रोज प्रकृ़ति के बनाये दिन और रात को व्‍यतीत करते हैं, जब कहीं भी हमारे बीच इस तरह की घटनायें घटित होती हैं तो हमारे वजूद को अन्‍दर तक हिला कर रख देती हैं ।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

झकझोरती रचना दिलीप जी

वन्दना ने कहा…

deelip ji
hila kar rakh diya ........hindustan ke sach ko aaina dikha diya..........magar soyi huyi aatmayein kab jaga karti hain, marta hai hindustan to marne do,apna to koi mara nahi.........is falsafe ko bakhubi ukera hai........hriday vyathit ho gaya.........sach kadva hota hai na.

Suman ने कहा…

nice

स्वाति ने कहा…

बहुत सटीक लिखा है

सुनील दत्त ने कहा…

आपकी रचना ने हमें एक वार फिर उतना ही वेचैन कर दिया जितने हम हर आतंकवादी बारदात के वाद होते हैं इसी पर हमने एकवार अपने मन के उदगार जैसे थे बैसे लिख दिए हथियार नहीं हैं बरना गद्दारों का कत्लयाम करने निकल पड़ते।
अगर हो सके तो हमारे मन की ब्यथा( देखो सेकुलर गद्दारो तुम्हारे पाले हुए हरामजादे आतंकवादी किस तरह निर्दोश आम जनता का खून बहा रहे हैं आओ देसभक्तो मिलकर कालिख पोते इन आतंकवादियों के समर्थक सेकुलर गद्दारों के रक्त रंजित चेहरों पर।) जरूर पढ़ें।

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बहुत सटीक लिखा है...
जब तक 'कुछ लोग' दिल से हिन्दुस्तान को अपना नहीं मानेंगे, तब तक हालात बेहतर होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है...?

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अफरीन अफरीन ........बेहद उम्दा ......

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…
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DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

aapka bahut aabhar, hausala badhane ke liye

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