अब तो भीड़ लगा दो चल के चूड़ी के बाज़ार में....

Author: दिलीप /



लोकतंत्र का मंदिर धधका, फिर भी हम खामोश रहे....
माँ कितना तड़पी होगी वो दिल के टुकड़े गोद लिए...
कुछ दमड़ी के टुकड़े देकर कुर्बानी को तोल दिया...
जिंदा है गद्दार अभी तक, उनको कैसा मोल दिया...

गीदड़ हमने चुन के भेजे, खुद अपनी सरकार में...
अब तो भीड़ लगा दो चल के चूड़ी के बाज़ार में...

कल ही तो गोली खाई थी, आज हमें कुछ याद नहीं...
वैसे भी वो जहाँ चली थी वो था अपना गाँव नहीं...
जला गया वो बस्ती सारी, खड़े तमाशा देख रहे...
माँ बहनों की लुटती इज़्ज़त से क्या आँखें सेंक रहे....

कुत्ते आज हमारी माँ को नोच रहे बाजार में...
अब तो भीड़ लगा दो चल के चूड़ी के बाज़ार में...

चोर घुसा घर मे चोरी की हम थे उस पल जाग रहे...
ज़रा इज़ाज़त दो तो पकड़े, पश्चिम का मुँह ताक रहे...
जब चाहा इक रोटी फेंकी जब चाहा दुत्कार दिया...
और उन्हीं की चौखट पे हम बेच रहे हैं लाल किला...

घुटनो के बल हम हैं बैठे पहलू मे सरकार के...
अब तो भीड़ लगा दो चल के चूड़ी के बाज़ार में...

लाचारी सड़कों पे मरती हम आगे बढ़ जाते हैं...
पड़े ज़रूरत तो उनको भी नोच नोच के खाते हैं....
कुछ को अब तक पता नही है क्या चिड़िया आज़ादी है...
पेट भरा हो तो आज़ादी का मतलब अय्याशी है....

बेकारी कुछ अय्याशी मे नंगे खड़े कतार में...
अब तो भीड़ लगा दो चल के चूड़ी के बाज़ार में...

प्यार भरोसा वादे सारे इक पल मे ही धूल हुए...
प्यार कभी पूजा होती थी शायद ये हम भूल गये...
मीरा ने भी प्यार किया था, सन्यासी बलिदानी सा...
आज प्रेम बन गया है रिश्ता, बस केवल जिस्मानी सा...

मजनू देखो बेच खा गया लैला झूठे प्यार में...
अब तो भीड़ लगा दो चल के चूड़ी के बाज़ार में...

28 टिप्पणियाँ:

दीपक 'मशाल' ने कहा…

सच कहा लगा दो भीड़ भाई चूड़ी बाज़ार में..

nilesh mathur ने कहा…

अब तो भीड़ लगा दो चलकर चूड़ी के बाजार में, वाह! दिलीप जी निश्चित ही लोगों का सोया हुआ स्वाभिमान जाग जाएगा!

Akhtar Khan Akela ने कहा…

jnaab aapne shi frmaayaa ke in sthitiyon men jb hm mzboot deshbhkt nhin bn skte to fir isse behtr to aapkaa sujhaav chudiyon ke baazaar men hi jaane kaa thik he mn jhkjhorne ki koshishon men hm bhi aapke saath hen. akhtar khan akela kota rajasthan

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

Bahut khoob !

दिलीप ने कहा…

aap sabhi sajjanon ka bahut abhaar roj bas yahi prayaas kar raha hun..ki soya swaabhimaan jaag jaaye...aapke tippani roopi vichaaron se lagta hai wo din jaldi hi aayega...

Shekhar Suman ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Shekhar Suman ने कहा…

bahut khub likha hai dileep bhai...
mere blog ka bhi rukh karein.......

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

अब तो भीड लगा दो चल के चुडी के बाजार में..
पहना घागरा, लगा के बिंदी बैठा तो वैश्या बाजार में..
ये नेता तो वैश्या से भी गये-गुजरे हैं
तब भी शरम ना खायेंगे...
बेच के लाल किले को ये तो
मुछो पे ताव दे, खुद को मर्द केह्ल्वायेंगे.

'उदय' ने कहा…

....prasansaneey rachanaa !!!

दिलीप ने कहा…

waah anamika ji kya baat kahi...

शिवम् मिश्रा ने कहा…

दिलीप, भाई बहुत बढ़िया ...........तुम्हारी लेखनी को सलाम करता हूँ !! गजब चोट करते हो जहन पर !!

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

जोश से भर देने वाली रचना .....कहीं-कहीं कुछ हमारी कायरता का भी...जिक्र किया है ....एक शानदार प्रस्तुति ...बहुत खूब ...

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

क्या कहें दिलीप भाई जज्बात का सुन्दर चित्रण्। आभार! जन सैलाब उमड़ पडे इस जज्बे को लेकर तो गद्दार कहाँ टिकेन्गे। और वह दिन आयेगा।

दिलीप ने कहा…

Suryakant ji bas usi din ka intzaar hai...sadhuvaad...

दिलीप ने कहा…

Rajendra ji bahut bahut shukriya saraahne ke liye...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

वाह! वाह!

sm ने कहा…

अब तो भीड़ लगा दो चलकर चूड़ी के बाजार में
truthful
excellent poem

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

वाह दिलीप जी! क्या बात है ! बहुत ही जोशपूर्ण और विचारोत्तेजक रचना है ! कभी मैं आपको देखूं कभी कलम के धार को ...

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

आप की कवितायेँ समझने के लिए मुझे अपने छोटे से मस्तिष्क पर जोर नहीं डालना पड़ता है। सच कहूँ तो ये दिमाग को कष्ट देती ही नहीं सीधा दिल में उतर जाती हैं। यार तुम सच में मुझे विचार शुन्य कर देते हो।

sangeeta swarup ने कहा…

झकझोर देने वाली कविता....सब चूड़ी ही पहनने लायक हो गए हैं....आक्रोश शब्द शब्द से फूट कर बाहर आ रहा है...

वन्दना ने कहा…

सटीक चोट करते हैं………………किसी का तो अंतर्मन जागे……………आज के हालात का सटीक चित्रण्।

निर्झर'नीर ने कहा…

अब कहाँ चिरैय्या सोने की है यहाँ बाज का राज
लोकतंत्र में ही होता है गधों के सर पे ताज

दिलीप जी ..आपकी कलम और आपकी सोच वन्दनीय है और ये खुशकिस्मती है हमारी की आपने हमारा प्रोत्साहन किया

दिलीप ने कहा…

achcha lagta hai ki aap sabhi mere bhavon ko saraahte hain...apna sneh aur ashirwad yunhi banaye rakhein...

just explore me ने कहा…

आपने तो कमाल कर दिया दिलीप साहब .......लोगो को झकझोरने में आपका कोई सानी नहीं ! बहुत बहुत साधुवाद स्वीकार करे ! विनय पाण्डेय

दिलीप ने कहा…

Shukriya Vinay ji...

aarya ने कहा…

दूसरों के हाथों बेच रहे हैं
नेता अपने देश को
कोस रहे हैं मानवतावादी
पैसे लेकर देश को
दोनों ने बाजार लगा दी
जिन्दा लटका कर देश को
अब भी मौका है खुद संभलो
चलो बचालो देश को

नहीं सुनी अबकी बारी तो कैसे जियोगे संसार में
नहीं तो, सही कहा !
अब तो भीड़ लगा दो चलकर चूड़ी के बाजार में
रत्नेश त्रिपाठी

kunwarji's ने कहा…

भईया आप भी अजीब हो!

कल ही तो कह रहे थे कि आँखों में अंगार चाहिए!हमने आँखों में अंगारे भरे तो आज आप फिर आंसू देखना चाह रहे हो आँखों में!नहीं आयेंगे जी!पानी तो अंगारों की गर्मी से पहले ही उभांप बन उड़ गया है जी!

कुंवर जी

दिनेश शर्मा ने कहा…

बेबाक अभिव्यक्ति।

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