विष्णुलोक मे आज मचा है, जाने कैसा शोर...
क्षीरजलधि मे हलचल कैसी, कोलाहल सब ओर...
शेषनाग भी मचल रहे है, हरि भी है बेचैन...
लक्ष्मी माँ के आज दिख रहे विकल बड़े ही नैन...
लक्ष्मी माँ के आज दिख रहे विकल बड़े ही नैन...
समाचार ही कुछ ऐसा था, अचरज सबको भारी...
खड़ी हुई थी विष्णुलोक मे, देव जातियाँ सारी...
अब तक प्रभु को नही मानता, कल मंदिर था आया...
पहली बार ही आके उसने स्वर्ण छत्र चढ़वाया...
स्वर्ण छत्र के साथ भक्त ने पत्र एक था भेजा...
पढ़ने को व्याकुल थे नारद, मुँह को चला कलेजा...
प्रभु हरि ने वो पत्र दिया फिर, मुनि नारद के हान्थ...
प्रभु आग्या पा फिर मुनि ने, पढ़ी पत्र की बात...
मैं था तुमको नही मानता, बता रहा क्यूँ आज...
रोज़गार था नही मिल रहा, खाली खाली हान्थ...
चप्पल जूते घिस- घिस टूटे, दिखी नही पर आस...
घर मे बूढ़ी अम्मा और बहनें भी हुई उदास...
बहनों की शादी की थी, निज काँधे ज़िम्मेदारी...
माँ की हालत बिगड़ रही थी, विकट हुई बीमारी...
घर क्या घर के बर्तन तक, कर्जे की भेंट चढ़े...
और देखता था मैं ये सब, बस चुपचाप खड़े...
पर फिर जाने कैसे तेरी कृपा हुई कुछ भारी...
कुछ दिन पहले ही था मुझको, काम मिला सरकारी...
इतने दिन की दुख की बदली रिश्वत ले ले छान्टी...
ले ले कर है घूस ना जाने कितनी जेबें काटी...
रिश्वत के वो नीर भरे घन, अब थे रोज़ बरसते...
नहीं देखता अब निज घर को, रोते और बिलखते....
पर कल ही दफ़्तर मे कोई छाती पीट रहा था...
नही दे रहा था वो रिश्वत, लगता ढीठ बड़ा था....
नही हुआ जब काम तो बोला, सड़ के मर जाओगे...
दूजे की मेहनत के दाने कब तक खा पाओगे...
फिर वो उपर देख चिंघाड़ा, कलियुग घोर है आया...
अब तो तुम नीचे आ जाओ, दिखा रहे क्यूँ माया....
शाम को फिर मैं रस्ते पर ही, चबा रहा था पान...
फीका पड़ गया पान, सुनी जब पन्वाडी की तान...
बोला भैया बोल रहा सच, कुछ सालों के बाद...
पापी सब मर जाएँगे, जब जन्मेंगे भगवान...
बस तबसे ही सोच रहा क्या, मर जाऊँगा मैं भी...
पाप किए हैं मैने भी तो, सड़ जाऊँगा मैं भी...
तभी गया बाज़ार खरीदा स्वर्ण छत्र ये भारी...
चढ़ा रहा हूँ तुमको भगवन, विनती सुनो हमारी...
अभी अभी तो दो बहनों के हुए हैं पीले हान्थ...
अम्मा की बीमारी भी अब कुछ दिन की है बात...
इसीलिए ये भेंट दे रहा, इसको मत ठुकराना...
तीस वर्ष उपरांत प्रभु ही, इस धरती पे आना...




