अब ये खिड़कियाँ बंद रहती हैं....

Author: दिलीप /


अब ये खिड़कियाँ बंद रहती हैं....
पहले बारिश की छीटें खटखटाती...
तो हवा खोल दिया करती थी खिड़कियाँ...
सब चाल थी तुम्हें खिड़की तक लाने की....
तुम्हारी छुवन घोल के ले जाती थी संग संग....
अब मंज़र बदल गया है....
हवा को डाँट देता हूँ...
वरना बारिश की छींटों के संग संग....
कुछ छीटें तुम्हारी भी जाती हैं....
पूरा कमरा भीग जाता है और संग संग आँखें भी....
बस इसीलिए
अब ये खिड़कियाँ बंद ही रहती हैं....

15 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

कितनी बंद कर लें खिड़कियाँ...ये दस्तक चैन कहाँ लेने देगी.....

अनु

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्मृतियाँ रह रह बरसती हैं।

संध्या शर्मा ने कहा…

ये छींटे बंद खिडकियों से भी आ जाते हैं, भिगो जाते हैं...

kshama ने कहा…

Sach kabhi,kabhi kayi khidkiyan ek saath band ho jatee hain!

Mahi S ने कहा…

Touched..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

सुन्दर रचना!

अनाम ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन।

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत ही बढिया ।

कल 01/08/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.
आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


'' तुझको चलना होगा ''

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

आँखें भीगना यूँ ही नहीं है.....

शायद वर्तमान की स्थितियाँ सुखद अनुभूति में तुलनात्मक रूप से पुरानी के कमतर हैं? इसीलिए हवा के झोंकों को, खिडकियों को जबरन बंद करके रोका जाता है.

हिमानी ने कहा…

हवा को डांट देता हूं....
इस एक लाइन में जो दर्द बयां हो रहा है न वो पूरी कविता पर भारी है....अच्छी अभिव्यक्ति

देवदत्त प्रसून ने कहा…

भावों में भर गया 'प्रदूषण',मन की खिडकी कर लो बन्द |
गीतों की मिट चुकी मृदुलता,नहीं मधुरता भरते छन्द ||
बदली से ज्यों चाँद घिर गया,पडी चांदनी है धुँधली-
फीका फीका 'हास' सलोना,कितना नकली है आनन्द ||

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

देवदत्त प्रसून जी,

आपने काव्य की बहुत सुन्दर पंक्तियाँ पढ़ने को दीं.... आनंद आया.

Saumya ने कहा…

too good!!

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