काग़ज़ों में आज कुछ नमी सी है...

Author: दिलीप /


ज़िंदगी अब भी उस किताब में मिलती है मुझे...
थोड़ी सूखी हुई, थोड़ी सी महकती सी है...

छुओ किताब तो इक नब्ज़ का एहसास मिले...
वो कली दफ़्न सही, फिर भी धड़कती सी है...

कभी कभी जो रिवाजों की भीड़ में हांफा...
उसी को चूम कर थोड़ी सी ज़िंदगी ली है...

जब भी खोलो किताब लफ्ज़ शायरी सी कहें...
तुमने बेजान से लफ़्ज़ों को मौसिकी दी है...

हमको टूटी मिली इक पंखुड़ी, ये ज़िंदगी की...
हो न हो, तुमने मेरी याद में कमी की है...

मुझे यकीन है कल रात ज़िंदगी रोई...
तभी तो काग़ज़ों में आज कुछ नमी सी है...

13 टिप्पणियाँ:

vandan gupta ने कहा…

मुझे यकीन है कल रात ज़िंदगी रोई...
तभी तो काग़ज़ों में आज कुछ नमी सी है...
आह !!!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत उम्दा!
बरसात का मौसम है भाई!

Prakash Jain ने कहा…

adbhut

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आज कुछ न लिखो स्याही से, लोग कागज को दोष देंगे..

अजय कुमार झा ने कहा…

रविवारीय महाबुलेटिन में 101 पोस्ट लिंक्स को सहेज़ कर यात्रा पर निकल चुकी है , एक ये पोस्ट आपकी भी है , मकसद सिर्फ़ इतना है कि पाठकों तक आपकी पोस्टों का सूत्र पहुंचाया जाए ,आप देख सकते हैं कि हमारा प्रयास कैसा रहा , और हां अन्य मित्रों की पोस्टों का लिंक्स भी प्रतीक्षा में है आपकी , टिप्पणी को क्लिक करके आप बुलेटिन पर पहुंच सकते हैं । शुक्रिया और शुभकामनाएं

सदा ने कहा…

मुझे यकीन है कल रात ज़िंदगी रोई...
तभी तो काग़ज़ों में आज कुछ नमी सी है...
मन को छूते हुए शब्‍द ...

अनाम ने कहा…

मुकम्मल ग़ज़ल.....दाद कबूल करें।

Arvind Mishra ने कहा…

एक यादगार रचना

Pallavi saxena ने कहा…

दिलीप जी कहाँ से लाते हैं आप यह कोमल जज़्बात और यह खूबसूरत अल्फ़ाज़ जो सीधा दिल पर दस्तक देते है ...

शारदा अरोरा ने कहा…

khoobsoorat

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

बेहतरीन.............

दिलीप ने कहा…

bahut bahut shukriya doston

Ashish ने कहा…

अव्वल दर्जे की बेहेतरीन ग़ज़ल...वाकई बहुत ही उम्दा!!

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