बस्ती में प्यासे मर रहे हैं लोग...

Author: दिलीप /


ज़रूरत है मदारी, और करतब कर रहे हैं लोग...
वहाँ घुटने ही दिखते हैं जहाँ पर सर रहे हैं लोग...

उधर भी गम यही हैं, ख्वाब भी, खुशियाँ भी ये ही हैं...
लकीरों से ज़मीं की, खामखा ही डर रहे हैं लोग...

चुनावों की अजब होली के अब आसार दिखते हैं...
वहाँ पर खून से अपने कुओं को भर रहे हैं लोग...

अजब जम्हूरियत का इक तमाशा, है हमारा मुल्क...
कहीं पर जिस्म खाली और कहीं पर चर रहे हैं लोग...

थी सपनों की दुकानें, लूट ली दंगाइयों ने कल...
ये बोनस मजहबों का है, घरों को भर रहे हैं लोग...

मकानों में नरम रिश्तों की गर्मी रह नहीं पाती...
यकीं होता नहीं इस ही शहर में, घर रहे हैं लोग....

तरक्की की परत मे दब गये, कुछ ख्वाब अधनंगे...
इसी सूखी नदी के दो मुहानों पर रहे हैं लोग...

जहां मे लोग तो उम्मीद से ज़्यादा खरे उतरे...
खुदा जो सोच न पाया, वही सब कर रहे हैं लोग...

है इतना ख़ौफ़ खाने लाश, कौवे भी नहीं आते...
यकीं होता नहीं, इस मुल्क मे मंदर रहे हैं लोग...

छीना झपटी, और घुड़की, और बंदर-बाँट...
कोई कल कह रहा था कि कभी बंदर रहे हैं लोग...

तेरी इक लट से बीते साल, बादल बाँध आया था...
गिरह वो खोल दो, बस्ती में प्यासे मर रहे हैं लोग...

7 टिप्पणियाँ:

Prakash Jain ने कहा…

Behtareen..Adbhut

Ashish ने कहा…

Just too good...bahut khoob!!

M VERMA ने कहा…

अजब जम्हूरियत का इक तमाशा, है हमारा मुल्क...
कहीं पर जिस्म खाली और कहीं पर चर रहे हैं लोग...

लाजवाब

vandan gupta ने कहा…

वाह वाह वाह ………शानदार गज़ल

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन और दमदार..

दिलीप ने कहा…

shukriya doston

अनाम ने कहा…

bahut khubsurat gazal....daad kabul karen

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