एक दिन भाई भाई को ही, दुश्मन बनते देखा है...
हमने आँगन बच्चों का भी, उस दिन बँटते देखा है...
जबसे माँ ने इस बाजू पर, बाँधी इक काली डोरी...
हमने हर तूफान को थमते, और तड़पते देखा है....
जबसे ये महंगाई बनके, मेहमां घर में आई है...
मिट्टी के ठंडे चूल्हों को, आँख से गलते देखा है...
यहाँ सियासत हमने देखा, जंगल से भी बदतर है...
यहाँ पे चूहों को अक्सर ही, साँप निगलते देखा है...
वहाँ इमारत के बाजू मे, एक झोपड़ी रहती है...
शाम से पहले उसका सूरज, हमने ढलते देखा है...
शोहरत अगर मिले तो मौला, पैर ज़मीन के अंदर हो...
ऊँचे पेड़ों को अक्सर ही हमने कटते देखा है...
कहाँ ईश है कहाँ खुदा है, बड़ी कशमकश है दिल मे...
हमने मंदिर मस्जिद खातिर, इक घर जलते देखा है...
डूब गयी जब कलम हमारी प्यार के गहरे सागर मे...
दर्द की उंगली थामे थामे, उसे उबरते देखा है...
कभी अगर लिखने बैठे और, गिरी आँख से बूँद 'करिश'...
हमने उन शेरों मे, तेरा अक्स उभरते देखा है...
हमने आँगन बच्चों का भी, उस दिन बँटते देखा है...
जबसे माँ ने इस बाजू पर, बाँधी इक काली डोरी...
हमने हर तूफान को थमते, और तड़पते देखा है....
जबसे ये महंगाई बनके, मेहमां घर में आई है...
मिट्टी के ठंडे चूल्हों को, आँख से गलते देखा है...
यहाँ सियासत हमने देखा, जंगल से भी बदतर है...
यहाँ पे चूहों को अक्सर ही, साँप निगलते देखा है...
वहाँ इमारत के बाजू मे, एक झोपड़ी रहती है...
शाम से पहले उसका सूरज, हमने ढलते देखा है...
शोहरत अगर मिले तो मौला, पैर ज़मीन के अंदर हो...
ऊँचे पेड़ों को अक्सर ही हमने कटते देखा है...
कहाँ ईश है कहाँ खुदा है, बड़ी कशमकश है दिल मे...
हमने मंदिर मस्जिद खातिर, इक घर जलते देखा है...
डूब गयी जब कलम हमारी प्यार के गहरे सागर मे...
दर्द की उंगली थामे थामे, उसे उबरते देखा है...
कभी अगर लिखने बैठे और, गिरी आँख से बूँद 'करिश'...
हमने उन शेरों मे, तेरा अक्स उभरते देखा है...

