हमने उन शेरों मे, तेरा अक्स उभरते देखा है...

Author: दिलीप /

एक दिन भाई भाई को ही, दुश्मन बनते देखा है...
हमने आँगन बच्चों का भी, उस दिन बँटते देखा है...

जबसे माँ ने इस बाजू पर, बाँधी इक काली डोरी...
हमने हर तूफान को थमते, और तड़पते देखा है....

जबसे ये महंगाई बनके, मेहमां घर में आई है...
मिट्टी के ठंडे चूल्हों को, आँख से गलते देखा है...

यहाँ सियासत हमने देखा, जंगल से भी बदतर है...
यहाँ पे चूहों को अक्सर ही, साँप निगलते देखा है...

वहाँ इमारत के बाजू मे, एक झोपड़ी रहती है...
शाम से पहले उसका सूरज, हमने ढलते देखा है...

शोहरत अगर मिले तो मौला, पैर ज़मीन के अंदर हो...
ऊँचे पेड़ों को अक्सर ही हमने कटते देखा है...

कहाँ ईश है कहाँ खुदा है, बड़ी कशमकश है दिल मे...
हमने मंदिर मस्जिद खातिर, इक घर जलते देखा है...

डूब गयी जब कलम हमारी प्यार के गहरे सागर मे...
दर्द की उंगली थामे थामे, उसे उबरते देखा है...

कभी अगर लिखने बैठे और, गिरी आँख से बूँद 'करिश'...
हमने उन शेरों मे, तेरा अक्स उभरते देखा है...

और कहाँ कुछ माँगा था...

Author: दिलीप /


सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...जल्दी ही आप सभी को पढ़ भी पाऊँगा...
जीने की कुछ उम्मीदें दो, और कहाँ कुछ माँगा था...
थोड़ी सी अपनी साँसें दो, और कहाँ कुछ माँगा था...

गंगा जमुना छुपी रहें पर, लब ये चौड़े हो जाए...
संगम सी रौनक हो जाए और कहाँ कुछ माँगा था...

उधर गली मे ताज़ा ताज़ा, किसी ने इज़्ज़त नोची है...
पगली ने रोटी माँगी थी, और कहाँ कुछ माँगा था...

बूढ़ी थी वो नीम की डाली, लटका वो और टूट गयी...
बोझ ज़रा सा कम हो जाए, और कहाँ कुछ माँगा था...

मुन्ना अपना अफ़सर है अब, कहाँ गाँव मे आएगा...
बच्चा थोड़ा पढ़ लिख जाए, और कहाँ कुछ माँगा था...

डूबे घर की छत पर बैठा, हरिया है ये सोच रहा...
सावन थोड़ा जल्दी आए, और कहाँ कुछ माँगा था...

दरवाजे पर देखो कबसे, मौत हमारे खड़ी हुयी...
थोड़ी सांसें ही कम आयें और कहाँ कुछ माँगा था....
 
मैं रोऊँ तो तू हँसती है, हुई तसल्ली आज 'करिश'...
तेरी ही खुशियाँ माँगी थी, और कहाँ कुछ माँगा था...

                                                     - करिश

एक कटोरी याद से तेरी, खाकर फिर दो ग़ज़ल 'करिश'...

Author: दिलीप /

www.hamarivani.com

बहुत दिनों बाद आज फिर से आपके सामने आया हूँ... ज़िन्दगी जीना सीख रहा था...जब नहीं सीख पाया तो फिर से फक्कड़ी बन के जीने चला आया...उम्मीद है आपका प्यार ज़रूर मिलेगा....ग़ज़ल विधा में थोडा लिखने का प्रयास किया है....बताइयेगा कैसा लगा ये प्रयास....

तेरा गम जब भी चखता हूँ, कड़वा सा हो जाता हूँ.... 
धीरे से अम्मा कहता हूँ, मैं मीठा हो जाता हूँ...

अँधा एक पपीहा देखो, रोज़ तरसता सावन को...
  मर जायें वो उम्मीदें , रोज़ वहाँ रो आता हूँ...

ग़ज़ल बगल मे बाँध के अपने, तेरी राह गुज़रता हूँ...
 जाता हूँ बाजार, बेचने, रोज़ वहीं खो आता हूँ...

वहाँ जहाँ पर एक भिखारी, मरा पड़ा था दो दिन से... 
चिल्लर थोड़े फेंक के अपने, पाप ज़रा धो आता हूँ...

जब लगता है फसल तुम्हारी, यादों की हो गयी खराब... 
दिल को आँखों से नम करके, बीज ज़रा बो आता हूँ...

एक कटोरी याद से तेरी, खाकर फिर दो ग़ज़ल 'करिश'... 
और आँख का पानी पीकर, मैं भूखा सो जाता हूँ....

                                                                                     -दिलीप तिवारी 'करिश'

दो मुझे वरदान माँ.....

Author: दिलीप /


इस कलम को प्राण जो तूने दिया उपकार तेरा,
भाव का विस्तार जो तूने दिया उपकार तेरा...
भाव की इस मृत मृदा को उंगलियों का स्पर्श देकर...
ये विविध आकार जो तूने दिया उपकार तेरा...

आज पर वरदान तुझसे एक माँ मैं चाहता हूँ...
मैं अकिंचन आज तुझसे स्वप्न अपने बाँटता हूँ...
न अमरता न तो यश ही, न विजय की चाह मुझको...
मृत्यु, अपयश, हार से निर्भीक होना चाहता हूँ...

तेरी भक्ति की ज़रा स्याही पिला मेरी कलम को...
ऋण चुकाने की धरा का शक्ति दे मेरी कलम को...
जब लिखूं मैं सत्य मेरी लेखनी न लड़खड़ाए...
तू अभय का ग्रास कोई अब खिला मेरी कलम को...

डूबता यह पूर्व का दिनकर पकड़ कर खींच लाए...
मूर्छित होते हुए मन को छुए और सींच जाए...
दो मुझे वरदान माँ जब साँस भी उखड़े कलम की...
लेखनी उसकी चले यूँ यम को भी जो जीत जाए...

आज अपनी लेखनी माँ मैं तुझे करता समर्पित...
ज्योत धीमी ही सही पर भाव से रखना अखंडित...
चाह है परिवर्तनों की, क्रांति की, फिर शांति की...
फिर तुम्हारी राह मे ये प्राण कर दूँगा विसर्जित....

ए शाम! आख़िर तुम मुझसे इतना शरमाती क्यूँ हो...

Author: दिलीप /


बचपन मे जब खेल मेरा हाथ थाम चला ही होता था..
जब लगता था की बस तुम्हे छूने ही वाला हूँ...
तू जाने कहाँ छिप जाती थी...
तेरा घर निहारता था, तो बरामदे मे तुम्हारी माँ बैठी मिलती थी...
जवानी मे जब एक हाथ से कुछ एहसास बाँधे बैठता था...
बहुत मुश्किल से, कुछ डरते, कुछ छिपते...
तब भी मन करता था दूसरे हाथ से तुझे भी थाम लूँ...
पर जाने क्या जलन थी तुम्हे...
मेरे एहसास जानकर भी भाग ही जाती थी...
आज उम्र के साहिल फिर बैठा हूँ तन्हा अकेला...
तुम्हारी बाहों के इंतज़ार मे...
तुम्हारी आँखों मे हर याद फिर से जी लेने के लिए...
पर जानता हूँ तुम फिर से जल्दी मे ही होगी...
आज बता ही दो मुझे...
ए शाम ! आख़िर तुम  मुझसे इतना शरमाती क्यूँ हो...