दो मुझे वरदान माँ.....

Author: दिलीप /


इस कलम को प्राण जो तूने दिया उपकार तेरा,
भाव का विस्तार जो तूने दिया उपकार तेरा...
भाव की इस मृत मृदा को उंगलियों का स्पर्श देकर...
ये विविध आकार जो तूने दिया उपकार तेरा...

आज पर वरदान तुझसे एक माँ मैं चाहता हूँ...
मैं अकिंचन आज तुझसे स्वप्न अपने बाँटता हूँ...
न अमरता न तो यश ही, न विजय की चाह मुझको...
मृत्यु, अपयश, हार से निर्भीक होना चाहता हूँ...

तेरी भक्ति की ज़रा स्याही पिला मेरी कलम को...
ऋण चुकाने की धरा का शक्ति दे मेरी कलम को...
जब लिखूं मैं सत्य मेरी लेखनी न लड़खड़ाए...
तू अभय का ग्रास कोई अब खिला मेरी कलम को...

डूबता यह पूर्व का दिनकर पकड़ कर खींच लाए...
मूर्छित होते हुए मन को छुए और सींच जाए...
दो मुझे वरदान माँ जब साँस भी उखड़े कलम की...
लेखनी उसकी चले यूँ यम को भी जो जीत जाए...

आज अपनी लेखनी माँ मैं तुझे करता समर्पित...
ज्योत धीमी ही सही पर भाव से रखना अखंडित...
चाह है परिवर्तनों की, क्रांति की, फिर शांति की...
फिर तुम्हारी राह मे ये प्राण कर दूँगा विसर्जित....

35 टिप्पणियाँ:

Sonal Rastogi ने कहा…

चित्र से सरस्वती शिशु मंदिर याद आ गया ..भावपूर्ण रचना

वन्दना ने कहा…

दो मुझे वरदान माँ जब साँस भी उखड़े कलम की...
लेखनी उसकी चले यूँ यम को भी जो जीत जाए...

बेहद खूबसूरत भावो के साथ नमन्।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़ी ही भावमयी, सुन्दर रचना।

Majaal ने कहा…

बचपन में हमारे syllabus में एक कविता थी, 'कुछ और भी दूँ', लगता है आपने भी वो पदी है, पर उसको कुछ उल्टा कर दिया है, और आपका अंदाज़ तो है हो ...

पवन धीमान ने कहा…

न अमरता न तो यश ही, न विजय की चाह मुझको...
मृत्यु, अपयश, हार से निर्भीक होना चाहता हूँ...
माँ भारती के चरणों में बहुत सुन्दर रचना.. आपके उत्कृष्ट चिंतन एवं लेखन को प्रणाम.

SKT ने कहा…

दिलीप भाई, इसमें आपकी लेखनी अपने पूरे शबाब पर है...ओज से भरपूर, तेज से प्रखर! मानों मांगने से पहले ही माँ ने आपकी झोली भर दी हो! वाह!!

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

सुन्दर कविता.....

anupama's sukrity ! ने कहा…

बहुत सुंदर-
आशीष और शुभकामनाएं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ”) ने कहा…

जगद् गुरू माँ सरस्वती को नमन!
--
गुरू साक्षात् पारब्रह्म तस्मैं श्री गुरवे नमः!

JHAROKHA ने कहा…

Bahut sundar aura bhaavapoorna rachanaa.hardika shubhkamnayen.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रार्थना ....

Archana ने कहा…

माँग लिया मैने भी ......

हमारीवाणी.कॉम ने कहा…

बहुत खूब!



क्या आप ब्लॉग संकलक हमारीवाणी.कॉम के सदस्य हैं?

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

प्रिय बंधु दिलीप जी
सस्नेहाभिवादन !
दो मुझे वरदान मां … बहुत सुंदर और भावपूर्ण गेय रचना है । आपने छंद और लय का साधिकार निर्वहन किया है , बधाई !

एक एक शब्द आपकी आस्तिक प्रवृत्ति , राष्ट्र भक्ति और संकल्पबद्ध इच्छाशक्ति का परिचायक है ।

काव्य में जब इन संयोगों का समागम होता है तो ऐसी ही श्रेष्ठ रचनाओं का सृजन होता है ।

उत्तरोतर प्रगति पल्लवन हेतु पूरे मन से आपको बधाई और शुभकामनाएं हैं !


- राजेन्द्र स्वर्णकार

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।

सुमन'मीत' ने कहा…

बेहतरीन कविता................

दीपक 'मशाल' ने कहा…

fir kamaal kiya..

राजीव तनेजा ने कहा…

अर्चना चाव जी से आपके ब्लॉग का पता चला...
बहुत ही प्रभावी और सच्ची रचना लगी ....

Parul ने कहा…

bahut sundar1

SANJEEV RANA ने कहा…

bahut sunder

Pratul ने कहा…

दिलीप जी रचना पढ़ ली.
"मृत्यु, अपयश, हार से निर्भीक होना चाहता हूँ.."

कमाल की तमन्ना है आपकी.

Shekhar Suman ने कहा…

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मेरे ब्लॉग पर इस मौसम में भी पतझड़ ..
जरूर आएँ..

निर्झर'नीर ने कहा…

आज अपनी लेखनी माँ मैं तुझे करता समर्पित...
ज्योत धीमी ही सही पर भाव से रखना अखंडित...
चाह है परिवर्तनों की, क्रांति की, फिर शांति की...
फिर तुम्हारी राह मे ये प्राण कर दूँगा विसर्जित...

bahut hi sundar samarpit bhaav

निर्झर'नीर ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

जब लिखूं मैं सत्य मेरी लेखनी न लड़खड़ाए...
तू अभय का ग्रास कोई अब खिला मेरी कलम को...

क्या बात है ... कई दिन ब्लॉग जगत से दूर रहा ... इसलिए पता ही नहीं चला आपकी वापसी का ... अच्छा लग रहा है फिर से आपकी रचनाओं को पढ़ पा रहा हूँ ...

शिवम् मिश्रा ने कहा…

जन्मदिन की बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ!

Umra Quaidi ने कहा…

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत सुन्दर!
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम ॥

अशोक मिश्र ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है .......
भारत माता की जय .........

बधाई हो ....
http://nithallekimazlis.blogspot.com/

mridula pradhan ने कहा…

wah. bahut achcha.

shiva ने कहा…

आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ,अच्छी रचना , बधाई ......

shekhar suman ने कहा…

kahan chale gaye bhaiya ?????achhi kawitayein padhe zamana beet gaya...

chirag ने कहा…

bahut bahut dhanaywad pahle to mere blog ko follow karne k liye
umeed karta hu aapaki tippani se mujhe kaafi kuch sikhane ko milega

kaafi acchi kavita hain
har panktiyo main bhav hain...
http://seemywords-chirag.blogspot.com/

kunwarji's ने कहा…

dilip ji nav varsh haardik shubhkaamnaaye swikaar kare.....

aapke bina blog jagat suna-suna sa lagta hai....
naye varsh me nayi shuruaat kar hi dijiyega...

kunwar ji,

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