ख्वाब में चावल के कुछ दाने दिखे...

Author: दिलीप /

मिन्नतें रोटी की वो करता रहा...
मैं भी मून्दे आँख बस चलता रहा...

आस में बादल की, धरती मर गयी...
फिर वहाँ मौसम सुना अच्छा रहा...

दूर था धरती का बेटा, माँ से फिर...
वो हवा में देर तक लटका रहा...

काग़ज़ों पर फिर ग़रीबी मिट गयी...
और जो भूखा था, वो भूखा रहा...

घर जले, बहुएँ जली, अरमां जले...
आग का ये कारवाँ चलता रहा...

अधपके एहसास, कच्ची चाहतें...
एक थाली ख्वाब वो चखता रहा...

मौत ने आकर के सुलझाया उसे...
रात भर इक नज़्म में उलझा रहा...
ख्वाब में चावल के कुछ दाने दिखे...
नाम उन पर रात भर लिखता रहा...
हर खबर अख़बार की खूं से सनी...
चाय की चुस्की मे सब घुलता गया...

सब जो रट के आए थे वो कह गये...
और जो मुद्दा था वो मुद्दा रहा...

कौन लेगा मुल्क़ की तकलीफ़, जब...
सबने सोचा जो हुआ अच्छा हुआ...
 

9 टिप्पणियाँ:

ajay yadav ने कहा…

achha hi

yashoda agrawal ने कहा…

आपने लिखा....हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए शनिवार 27/07/2013 को
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
पर लिंक की जाएगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पेटू पीड़ित भाषा है,
देता अजब दिलासा है।

vandana gupta ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(27-7-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

शारदा अरोरा ने कहा…

badhiya abhivyakti..

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

अच्छी लगी ग़ज़ल।

rahul ने कहा…

nice....

sushma 'आहुति' ने कहा…

मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति ......

Anita (अनिता) ने कहा…

बहुत ही बढ़िया....! एक-एक शेर दिल के बहुत क़रीब से गुज़रा....

~सादर!!!

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