हो सके तो दिल को ही अपने शिवाला कीजिए...

Author: दिलीप /

भूखे दिल को इन्क़लाबी इक निवाला दीजिए...
बर्फ जैसे खून में थोड़ा उबाला दीजिए...

मुल्क की माँओं, बनाना राम जो मुश्किल लगे...
कोख की मिट्टी से इक चाणक्य ढाला कीजिए...

सीखने को है बहुत कुछ राम के किरदार में...
न मुझे शंभूक का झूठा हवाला दीजिए....

कब तलक हौव्वा संहालेगी दुपट्टा हाथ से...
आप ही अपनी ज़रा नज़रें सम्हाला कीजिए...

लाँघ कर दहलीज रातें, लील जाएँ दिन अगर...
रूह को सूरज बनाकर कुछ उजाला कीजिए...

मौत पर कब तक चलेगा यूँ तमाशा बोलिए...
ज़िंदगी के हक़ का अब, मुद्दा उछाला कीजिए...

दौड़ते, इस आज की जब धूप में थक जाइए...
छाँव में माज़ी की, बीता कल खंगाला कीजिए....

मंदिरों और मस्जिदों में सिर रगड़ कर क्या मिला...
हो सके तो दिल को ही अपने शिवाला कीजिए...

8 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मुल्क की माँओं, बनाना राम जो मुश्किल लगे...
कोख की मिट्टी से इक चाणक्य ढाला कीजिए...

सीधे हृदय में उतरती पंक्तियाँ..

इमरान अंसारी ने कहा…

बेहद सुन्दर........

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जानिए क्या कहती है आप की प्रोफ़ाइल फोटो - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

kshama ने कहा…

लाँघ कर दहलीज रातें, लील जाएँ दिन अगर...
रूह को सूरज बनाकर कुछ उजाला कीजिए..
Kya gazab rachana hai ye!

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस शानदार प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार २३/७ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है सस्नेह ।

Rahul ने कहा…

मुल्क की माँओं, बनाना राम जो मुश्किल लगे...
कोख की मिट्टी से इक चाणक्य ढाला कीजिए

..... very nice....

expression ने कहा…

excellent....as always!!

anu

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

समय की जरूरत है कि माताएँ चाणक्य ,अर्जुन और सुभाष ढालें ,पुत्रियाँ दुर्गा और लक्ष्मीबाई सी , यों पालें !

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