चुनावी भाषणों में अब, भुना रहे हैं यहाँ..

Author: दिलीप /

सियासी आग के करतब, दिखा रहे हैं यहाँ...
नाखुदा मुझको भंवर में, फँसा रहे हैं यहाँ...

कोई क्लाइमैक्स सिनेमाई चल रहा है अभी...
मौत के बाद मेरी जाँ बचा रहे हैं यहाँ...

मैने कमरों में भर लिए हैं नुकीले पत्थर...
चुनाव आने की खबर दिखा रहे हैं यहाँ...

न मयस्सर हुई है आग जहाँ लाशों को..
सियासी आग का हवन करा रहे हैं वहाँ...

सऊर है नहीं जिनको सड़क पे चलने का...
गाड़ियाँ वो मुल्क़ की चला रहे हैं यहाँ...

जवान भूख ने माँगा जो उनसे काम ज़रा...
उसे चकले का रास्ता दिखा रहे हैं यहाँ...

आज लाशें चला रही हैं रथ सियासत का...
कई परतों में ज़िंदगी, दबा रहे हैं यहाँ...

एक शायर ने तब लिखी थी इन्क़लाबी ग़ज़ल...
चुनावी भाषणों में अब, भुना रहे हैं यहाँ...

9 टिप्पणियाँ:

vandan gupta ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(20-7-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खरी खरी बात कहती मारक गज़ल

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अजब कहानी कहते सत्ता के गलियारे,
जीत कल्पनागीत, यहाँ जन पल पल हारे।

kshama ने कहा…


आज लाशें चला रही हैं रथ सियासत का...
कई परतों में ज़िंदगी, दबा रहे हैं यहाँ...

एक शायर ने तब लिखी थी इन्क़लाबी ग़ज़ल...
चुनावी भाषणों में अब, भुना रहे हैं यहाँ...
Bade teekhe aashar hain....gahra matlab liye hue!

Jyoti khare ने कहा…

वर्तमान का सच
उत्कृष्ट प्रस्तुति
बधाई

आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
केक्ट्स में तभी तो खिलेंगे--------

Vandana Ramasingh ने कहा…

मौत के बाद मेरी जाँ बचा रहे हैं यहाँ...

आज लाशें चला रही हैं रथ सियासत का...
कई परतों में ज़िंदगी, दबा रहे हैं यहाँ...

एक शायर ने तब लिखी थी इन्क़लाबी ग़ज़ल...
चुनावी भाषणों में अब, भुना रहे हैं यहाँ...

bahut badhiya

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

सऊर है नहीं जिनको सड़क पे चलने का...
गाड़ियाँ वो मुल्क़ की चला रहे हैं यहाँ...

आज लाशें चला रही हैं रथ सियासत का...
कई परतों में ज़िंदगी, दबा रहे हैं यहाँ...
सच को उजागर करती शेअर !
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Rahul ने कहा…

Very nice ..as usual

Prakash Sah ने कहा…

वाह! लाजवाब। तात्कालिक परिस्थितियों पर चोट करती रचना।

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