चाँद देख कर मुन्ने ने पूछा...
"बाबा ! वो क्या है..."
सवाल मासूम था, जवाब भी मासूम होना था..
बोले, वो मक्खन की कटोरी है...
वो जो आस पास जगमगा रहे हैं...
वो चूहे हैं मक्खन खाने आ रहे हैं...
धीरे धीरे पूरी कटोरी चट कर जाएँगे...
"लेकिन बाबा चूहे चमक क्यूँ रहे हैं..."
अरे ! अंधेरा है न, तो लालटेन लेकर चल रहे हैं...
नहीं तो मक्खन कैसे ढूँढेंगे...
"अच्छा !!!"
बाप ये भी तो कह सकता था...
कि सब विज्ञान हैं आगे समझ जाओगे....
पर मुन्ने ने तो यह ही याद रखा...
उसके लिए तो बाबा कभी ग़लत नही हो सकते थे...
फिर कभी विज्ञान न समझ सका...
शायर हो गया...
फिर शायरी ने और कुछ होने न दिया...
धीरे धीरे वो मक्खन की कटोरी, रोटी में बदल गयी...
फिर रोटी भी ग़रीबी की अमावस खा गयी...
कल रोटी की चाहत में वो शायर नहीं रहा...
बस कुछ शेर छोड़ गया है....
कहता था, भूख से भी कभी शायरी मिटती है क्या....
काश ! कोई ये भी बता देता उसे...
शायरी से भूख भी नहीं मिटती...
9 टिप्पणियाँ:
सच कहा, शायरी से भूख नहीं मिटती है..
आह!!!!!
बिल्कुल सच कहा ...
इतना दर्द मत भरा करो रचनाओं में
क्या खूब बिम्ब प्रयोग.... वाह!
बहुत सुंदर रचना...
सादर।
क्या कहने??
दर्दभरी रचना पर लाजवाब ....
सुभानाल्लाह.....लाजवाब कर दिया इस पोस्ट ने।
.....दिलको छू गयी ...यह अबोध सी प्रस्तुति ...बहुत सुन्दर दिलीपजी !
excellent
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