कोहरा झोंक दिया करती थी...

Author: दिलीप /


याद है तुम...
लब खोलती थी और...
कोहरा झोंक दिया करती थी..
आईने की आँख मे...
फिर रोशनी का कोई टुकड़ा...
उंगली की पोर पर रख कर....
नाम लिख देती थी मेरा...
चमक जाता था आईना...
और साथ में, मैं भी...
अब आईनों पर कोहरे नहीं रखता कोई...
आँधी चलती है...
गर्द रह जाती है...
कुछ दिखता नहीं....
फिर बारिश होती है...
कुछ अंदर भी, कुछ बाहर भी...
पर आईना चमकता नहीं,
बस धुल जाता है...
और नाम मेरा जो फीका फीका चमक रहा था...
बुझ जाता है, बह जाता है...

8 टिप्पणियाँ:

***Punam*** ने कहा…

आईने की आँख मे...
फिर रोशनी का कोई टुकड़ा...
उंगली की पोर पर रख कर....
नाम लिख देती थी मेरा...
चमक जाता था आईना...
और साथ में, मैं भी...!

bahut khoob......!!

Anupama Tripathi ने कहा…

बहुत खूबसूरती से दर्द अभिव्यक्त किया है ...
मर्मस्पर्शी....रचना ...

poonam ने कहा…

bahut hi khubsurat

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अहा, बहुत ही अच्छा और अलग..

kunwarji's ने कहा…

kya sundar tareeke se sajaaya hai bhavo ko.... har shabd chamak gaya...

kunwar ji,

संध्या शर्मा ने कहा…

पर आईना चमकता नहीं,
बस धुल जाता है...
और नाम मेरा जो फीका फीका चमक रहा था...
बुझ जाता है, बह जाता है...
कितनी सरलता है दर्द को व्यक्त किया है आपने... बहुत सुन्दर भाव

इमरान अंसारी ने कहा…

वाह हमेशा की तरह शानदार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर भावप्रणव रचना!
इसको साझा करने के लिए आभार!

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