नन्हा मोहसिन...
दादा जी के साथ रोज़ मस्ज़िद जाता...
टोपी पहन के जब झुकता...
तो लगता तारा लिपट गया हो चाँद से...
बाहर निकलता, तो एक पल को ठिठक जाता...
मस्ज़िद के अहाते में लगे आम के पेड़...
को एकटक देखने लगता...
कोई पुराना रिश्ता था शायद...
जाता उसके पास कुछ पपड़ी जमे ज़ख़्मों पर...
अपने नन्हे हाथ से मरहम रख देता....
पेड़ को गुदगुदी होती...
हँसता तो एक एक पत्ता हिलने लगता...
पेड़ सोचता, अबके गर्मी आने दो...
कुछ मीठा खिलाऊँगा...
खैर वक़्त लुढ़का..गर्मी आई...
कच्ची कैरियाँ बाहों मे लटकाए..
धूप मे पका रहा था...
खुश था आख़िर मोहसिन को कुछ दे तो सकता था...
जैसे जैसे आम पकने लगे..उसकी खुशी बढ़ती गयी...
अपनी कलाइयाँ और नीचे कर दी थी...
शायद मोहसिन के लिए ही...
एक दिन सुबह मोहसिन आया...
पेड़ को निहारा...
वो उदास सिर झुकाए खड़ा था...
उसके पास देने के लिए कुछ नहीं बचा था...
कल शाम को कोई साहब आए थे...
बड़ी सी गाड़ी में...
सफेद कलफ किए हुए कुर्ते में...
उतार लिए सारे आम उन्होनें...
कोई बता रहा था...
उन्हे पके आमों का रंग नहीं पसंद था...
कह रहे थे की ये रंग काफिरों का है...
नन्हा मोहसिन भीगी पलकें लिए...
पूछता रहा दादाजान से...
"ये काफ़िर क्या होता है?"
6 टिप्पणियाँ:
अद्भुत.....
बहुत संवेदनशील रचना
excellent post.
हमने बाँटी है यह दुनिया,
उत्तर हमको देने होंगे।
उफ़्फ़ हद है ...
इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - बुंदेले हर बोलों के मुंह, हमने सुनी कहानी थी ... ब्लॉग बुलेटिन
सुभानाल्लाह क्या खूब लिखा है ।
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