अधूरी इक कहानी
हूँ, मुक़म्मल हो
ही जाऊँगा...
अभी इक घास
का तिनका हूँ,
जंगल हो ही
जाऊँगा...
तू यूँ लिपटी
रही मुझसे, जो
नागिन की तरह
जानां...
यकीं मुझको, ज़हर तेरे
से, संदल हो
ही जाऊँगा...
सदाएं हैं वफ़ा
की लब पे,
दिल में बेवफ़ाई
है...
इबादत तेरी ऐसी
है, तो मंदर
हो ही जाऊँगा...
तेरी वो खुरदुरी
बातें, औ मेरे
घिस रहे अरमां...
चुभन अपने ज़हन
की देख, खंज़र
हो ही जाऊँगा...
बड़े दिन हो
गये इस आँख
से आँसू नहीं
टपका...
है काग़ज़ कह रहा
मुझसे, मैं बंज़र
हो ही जाऊँगा...
ये नज़्मी मछलियाँ, आँखों
के मोती, और
खारापन...
जमा करते हुए
सब कुछ, समंदर
हो ही जाऊँगा...
