जमा करते हुए सब कुछ, समंदर हो ही जाऊँगा...

Author: दिलीप /

अधूरी इक कहानी हूँ, मुक़म्मल हो ही जाऊँगा...
अभी इक घास का तिनका हूँ, जंगल हो ही जाऊँगा...

तू यूँ लिपटी रही मुझसे, जो नागिन की तरह जानां...
यकीं मुझको, ज़हर तेरे से, संदल हो ही जाऊँगा...

सदाएं हैं वफ़ा की लब पे, दिल में बेवफ़ाई है...
इबादत तेरी ऐसी है, तो मंदर हो ही जाऊँगा...

तेरी वो खुरदुरी बातें, औ मेरे घिस रहे अरमां...
चुभन अपने ज़हन की देख, खंज़र हो ही जाऊँगा...

बड़े दिन हो गये इस आँख से आँसू नहीं टपका...
है काग़ज़ कह रहा मुझसे, मैं बंज़र हो ही जाऊँगा...

ये नज़्मी मछलियाँ, आँखों के मोती, और खारापन...
जमा करते हुए सब कुछ, समंदर हो ही जाऊँगा...

आज़ादी दी थी मुझे जिसने...

Author: दिलीप /

आज़ादी दी थी मुझे किसी ने...
कई साल पहले...
बड़े दिन संहाले रखी...
अब मोची से उसकी चप्पल बनवा ली है...
रोज़ जाता हूँ...
उसे पहनकर...
बेबसी के गोबर में...
रगड़ता हूँ, लथेड़ता हूँ...
फिर एक खास दिन...
साफ करता हूँ, चमकाता हूँ...
घिस गयी है अब वो...
टूटने वाली है...
किसी तरह बस...
मजबूरी की गोंद लगाकर...
दोनो पट्टे जोड़ रखे हैं...
टिकाऊ नहीं थी ये वाली आज़ादी...
इस बार खास वाले दिन...
लाल किले पर जो बोलेगा...
उसके मुँह पर फेंक के मारूँगा...
उस दिन भी वो वहीं खड़ा था...
आज़ादी दी थी मुझे जिसने...

नन्हा सा भिखारी

Author: दिलीप /

रात पूनम की है, नन्हा नहीं समझता ये...
रात, बेबस निगाह लेके है वो घूर रहा...
वो सोचता है वो सिक्का कभी गिरेगा कहीं...
अपने आका की पिटाई से वो बच जाएगा...

वो मासूम सा नन्हा सा भिखारी देखो...
हाथ फैलाए, दौड़ता है सड़क पर तन्हा...

मुझको भी तुम औरत कर दो...

Author: दिलीप /



मेरे कानों में बाँध दो झनकते सन्नाटे...
मेरे होंठों पे सुर्ख लाल सी चीखें रख दो...

मेरे माथे पे गोल चोट दो, कि खून रिसे...
मेरे हाथों मे गोल खनखनाती हथकड़ियाँ...

मेरे सूखे हुए अश्कों में अंधेरा घोलो...
सज़ा दो उसको मेरी आँख पे काजल की तरह...

गले में बाँध दो मजबूरियों का साँप कोई...
मेरी चोटी में अपनी काली हसरतें भर दो...

अपनी आँखों की पुतलियों को तुम बड़ा करके...
उन्हे जोड़ो, मेरे सीने से बाँध दो उनको....

मेरी कमर पे अपनी आँख की हवस बांधो....
हो मेरी उंगलियों में आग का छल्ला कोई...

मेरे पैरों में चमचमाती बेड़ियाँ बांधो...
उनमें खामोशियों के सुन्न से घुंघरू भी हों...

तुमने मर्दानगी को जब बना दिया गाली...
मुझे भी नोच लो, मुझको भी तुम औरत कर दो...

सूखा अख़बार खाया नहीं जाता मुझसे...

Author: दिलीप /

स्टेशन पर खड़ा था...
ट्रेन लेट थी...
भूख सी लगी...
सामने अख़बार मे लिपटी...
आलू पूड़ी बेचने वाला दिखा...
उससे खरीदा और खा ही रहा था...
कि एक सात-आठ साल का लड़का...
खड़ा हो गया सामने...
घूरने लगा...
मैने मुँह मोड़ा, पूडिया निपटाई...
और जैसे ही अख़बार फेंकने वाला हुआ...
उसने वो अख़बार माँग लिया...
मैने पूछा क्या करेगा...
पढ़ा लिखा है क्या...
बोला पढ़ा लिखा तो नहीं हूँ...
पर सुना है अख़बार में बड़ी चटपटी खबरें आती हैं...
ऊपर से वो आलू की सब्जी का मसाला भी ला गया है उसपे...
अख़बार और चटपटा हो गया है...
मैने पूछा, 'तो'?
बोला, 'तो क्या दो काम हो जाएँगे...
स्टेशन साफ भी रहेगा...
और ये अख़बार खाकर भूख भी मिट जाएगी...
साहब जीभ बड़ी चटोरी है मेरी...
इसीलिए सब 'चटोरा' बुलाते हैं...
सूखा अख़बार खाया नहीं जाता मुझसे...