प्रेम पर कुछ कलम चलाने कि कोशिश तो कि...पर देखिये क्या हुआ.... :)
जब तुझे पहली बार देखा दिल खुद ब खुद झुक गया...
बुतो को पूजने का सिलसिला जाने क्यूँ बस रुक गया....
कितनी मिन्नते करता हूँ तो तेरी एक झलक मिलती है...
तेरी रहमत पे दिल धड़कता है, मेरी साँस चलती है...
बस इतना कहूँगा की तू इन सारे नज़ारों से जुदा है...
मेरे महबूब ये देखकर, मुझे लगता है कि तू 'खुदा' है...
तेरी चमक मेरे दिल को अजीब सा सुकून पहुँचाती है...
पर जाने क्यूँ अक्सर तू दूर जा कहीं छुप जाती है...
पर फिर जब आती है तो दिल के अंधेरे खिल जाते हैं...
दिल के खामोश खंडहर ज्वार भाटे से हिल जाते हैं...
जाने तेरे होंठो का ये तिल क्या करता फरियाद है...
मेरे महबूब वो शायद यही कहता है कि, तू 'चाँद' है...
तेरी एक नज़र दिल की जलती जमी को बुझा देती है....
फिर मेरी ये प्यासी रूह तेरी आँखों को दुआ देती है...
पर कभी कभी तू ये इनायत अंजानो पे भी करती है...
कभी यूँही पलट जाती है फिर मुस्कुराहट बरसती है...
तेरी इक झलक को जाने कितने दिलों के मोर पागल है...
मेरे महबूब लगता है तू चाँद नही तू एक 'बादल' है...
पर जब देखता हूँ सब तेरी एक झलक को तरसते हैं...
किसी और की तरफ इनायत हो तो कितना जलते हैं...
तेरे लिए तो ना जाने कब एक दूसरे मे जंग हो जाए...
तू न हो तो कितनी ज़िंदगियाँ बस यूँही बेरंग हो जाए...
जब ये देखा तो समझा कि मेरी समझ कितनी छोटी है...
न खुदा, न चाँद, न बादल, मेरे महबूब तू तो 'रोटी' है...




