मेरे महबूब तू तो 'रोटी' है...

Author: दिलीप /



प्रेम पर कुछ कलम चलाने कि कोशिश तो कि...पर देखिये क्या हुआ.... :)


जब तुझे पहली बार देखा दिल खुद ब खुद झुक गया...
बुतो को पूजने का सिलसिला जाने क्यूँ बस रुक गया....
कितनी मिन्नते करता हूँ तो तेरी एक झलक मिलती है...
तेरी रहमत पे दिल धड़कता है, मेरी साँस चलती है...

बस इतना कहूँगा की तू इन सारे नज़ारों से जुदा है...
मेरे महबूब ये देखकर, मुझे लगता है कि तू 'खुदा' है...

तेरी चमक मेरे दिल को अजीब सा सुकून पहुँचाती है...
पर जाने क्यूँ अक्सर तू दूर जा कहीं छुप जाती है...
पर फिर जब आती है तो दिल के अंधेरे खिल जाते हैं...
दिल के खामोश खंडहर ज्वार भाटे से हिल जाते हैं...

जाने तेरे होंठो का ये तिल क्या करता फरियाद है...
मेरे महबूब वो शायद यही कहता है कि, तू 'चाँद' है...

तेरी एक नज़र दिल की जलती जमी को बुझा देती है....
फिर मेरी ये प्यासी रूह तेरी आँखों को दुआ देती है...
पर कभी कभी तू ये इनायत अंजानो पे भी करती है...
कभी यूँही पलट जाती है फिर मुस्कुराहट बरसती है...

तेरी इक झलक को जाने कितने दिलों के मोर पागल है...
मेरे महबूब लगता है तू चाँद नही तू एक 'बादल' है...

पर जब देखता हूँ सब तेरी एक झलक को तरसते हैं...
किसी और की तरफ इनायत हो तो कितना जलते हैं...
तेरे लिए तो ना जाने कब एक दूसरे मे जंग हो जाए...
तू न हो तो कितनी ज़िंदगियाँ बस यूँही बेरंग हो जाए...

जब ये देखा तो समझा कि मेरी समझ कितनी छोटी है...
न खुदा, न चाँद, न बादल, मेरे महबूब तू तो 'रोटी'  है...

10 रुपये का नोट ....(एक लघुकथा)

Author: दिलीप /


आज बहुत दिन बाद एक कहानी लिखी..धन्यवाद दूंगा दीपक 'मशाल' जी को, जिन्होंने प्रेरित किया...आपके लिए प्रस्तुत है एक लघुकथा...

दौड़ती भागती ज़िंदगी का कुछ पलों का ठहराव सा, ये लोकल ट्रेन का प्लॅटफॉर्म…यहाँ कदम रुकते हैं पर मन उसी रफ़्तार से चलता जाता है...कितना कुछ है यहाँ, किसी को किसी पे गुस्सा...घर के कुछ झगड़े... ऑफीस की माथापच्ची...खाली कंधों पे कितना बोझ है, आँखों के नीचे पड़े गड्ढों और माथे की शिकन से दिख जाता है...ऐसी ही एक मुर्दा भीड़ मे एक दिन मैं भी मुर्दा सा खड़ा...ऑफीस जाने की तैयारी मे था...चेहरे पे थोड़ी बहुत चमक इसलिए थी…क्यूंकी महीने का पहला हफ़्ता था, दिल ना सही बटुआ तो अमीर था...बटुआ खोलते ही एक मोटी हरी लकीर देखते ही बनती थी...उसी की चमक तो शायद मुँह पे हरियाली ला रही थी...वैसे मुँह पे हरियाली तो मुरझाए चेहरे दिखते नही पर जाने कैसे एक नन्ही मुरझाती कली पे नज़र पड़ी...बिखरे बाल बता रहे थे पानी से तो उनका रिश्ता बहुत पहले ही छूट गया होगा...तन पे फटे पुराने कुछ चीथड़े...शायद वो मैल की पर्त ही कुछ ठंड से बचाती होगी... उम्र तकरीबन 7 या 8 साल की होगी...पर मजबूरी तो समय से कुछ तेज़ ही चलती और बढ़ती है...अपने नन्हे हाथों से किसी का दामन पकड़ उसका मन खंगालने की कोशिश करती...आँखों मे पेट की भूख सजाए....कुछ पाने की चाहत मे चलती जा रही थी...ट्रेन आने मे अभी 15 मिनिट थे इसलिए चाय की चुस्कियों से अच्छा टाइमपास क्या होता, तो सामने ही एक टी स्टॉल पे पहुँच गया...ये बेंचने वालों की आँखों मे एक अजीब सा अपनापन होता है...बनावटी होता है या नहीं ये तो बता नही सकता...पर उनकी गर्मजोशी देख लगता है बस आपके लिए ही दुकान खोल के बैठा है...खैर चाय ली…एक दो घूँट ही मारे होंगे... कि वो नन्हा मन अपना ख़ालीपन समेटे मेरे सामने खड़ा था...महीने के शुरुआती दिन हो तो दिल थोड़ा दिलदार हो जाता है...ज़्यादातर तो अपने लिए ही...पर आज सोचा कुछ इसको भी दे ही दूं...बटुआ खंगाला...एक भी सिक्का नहीं...अरे होता है न...जेब मे हज़ारों पड़े हो, पर हम भिखारी और भगवान सिक्के से ही खुश करने की कोशिश करते हैं...खैर सिक्का नही मिला... हाँ शर्ट की जेब मे एक 10 रुपये का नोट पड़ा था...भीख मे 10 रुपये का नोट... कभी सुना है क्या...यही सोच उससे मुँह फेरने की नाकाम कोशिश की...पर जाने क्यूँ वो वहाँ से टस से मस न हुई...आख़िर इस डर से की कहीं मेरी पैंट छू के गंदी न कर दे...वो 10 का नोट निकाला और उसकी तरफ बढ़ा दिया...अब दिन भर खराब सा मन लिए घूमने से तो अच्छा था न की 10 रुपये चले जाए पर जान छूटे ...पर वहाँ तो स्थिति ही बदल गयी…10 का नोट देखते ही वो रोते रोते वहाँ से भाग गयी...10 का नोट हाथ मे ही रह गया, जाहिर सी बात है मुँह से एक ही बात निकली, ये भिखारी भी न...चाय वाला सब देख रहा था...अचानक बोला...साहब ना आपकी ग़लती है न उसकी...फिर उसने आगे बताया की पिछले महीने रात के वक़्त किसी ने 10 रुपये के बदले ही इसकी मासूमियत तार तार करने की कोशिश की थी...वो तो भला हो पोलीस का जो अपने स्वाभाव के विपरीत समय पर पहुँची और एक मासूम की मासूमियत को लुटने से बचा लिया...पर थे तो पोलीस वाले ही...पैसा लिया और उस अपराधी को भी छोड़ दिया...बस इसीलिए १० का नोट देखा तो वो रोकर भाग गयी...मैं स्तब्ध था…कहने के लिए कुछ ना बचा था...इस १० के नोट की कीमत उसके लिए मेरी समझ से भी कहीं ज़्यादा थी... जिस ओर वो भागी थी कुछ देर उस ओर देखा फिर खुद से एक अजीब सी बदबू आई...घिन सी हुई खुद से...अचानक ट्रेन की सीटी बजी...वो अपनी उसी रफ़्तार से चली आ रही थी...हाँ मेरी रफ़्तार ज़रूर कुछ कम हो गयी थी...खैर भीड़ का हिस्सा था तो उसी के साथ ट्रेन मे चढ़ गया...हाथ मे अब भी वो 10 का नोट था...उसे देखा तो आँखों के एक कोने से इंसानियत कुलबुला के टपक पड़ी...लेकिन उस नोट पे चिपका एक महापुरुष अभी भी हंस रहा था.... 

मैं कलम कुछ क्रांति की बात लिखना चाहती हूँ...

Author: दिलीप /


प्रेम मे डूबे हुए मैं गीत अब न लिख सकूँगी...
मैं मिलन की चाशनी मे शब्द लिपटे न चखूँगी...
हो भले चिर यौवना सौंदर्य की प्रतिमा भले हो...
मैं समेटे कोख मे शृंगारिता अब न रखूँगी...

मैं नहीं स्याही तुम्हारा रक्त बिंदु मांगती हूँ...
मैं कलम कुछ क्रांति की बात लिखना चाहती हूँ...

स्वान की भाँति लिपट कर वैभवो में खो न जाऊं...
जागरण का हो समय तो भीत हो मैं सो न जाऊं...
अब नही सम्मान ना ही रत्न का कुछ लोभ मुझको...
मोह मे पागल हुई इस भीड़ मे मैं खो न जाऊं...

विपरीत दिश में जो बहे वह धार बनना चाहती हूँ...
मैं कलम कुछ क्रांति की बात लिखना चाहती हूँ...

हैं उदर खाली पड़े उनको हँसा कर क्या करूँगी...
प्यास है जल की उन्हें मदिरा पिला कर क्या करूँगी...
चरमराती देह ले जो मार्ग मे औंधे पड़े हैं....
मैं उन्हे शृंगार के ये पद सुना कर क्या करूँगी...

पेट उनका भर सकूँ चूल्हे सी जलना चाहती हूँ...
मैं कलम कुछ क्रांति की बात लिखना चाहती हूँ...

आज मैं सत्ता नही बस सत्य तुमसे मांगती हूँ...
तांडव सा आज फिर से नृत्य तुमसे मांगती हूँ...
कालिमा इतिहास की मुझसे सहन न हो रही है...
नव सृजन इतिहास हेतु रक्त तुमसे मांगती हूँ....

मैं झुकी ग्रीवाओं मे इस्पात भरना चाहती हूँ...
मैं कलम कुछ क्रांति की बात लिखना चाहती हूँ...

मरता तो सरकार से पैसे ही मिल जाते, मेरे मरने से परिवार के दिन फिर जाते....

Author: दिलीप /


जाने एक नौजवान को क्या सनक चढ़ी...
जाने थी क्या खुराफात उसने मन मे गढ़ी...
वो जोश मे उठा और तेज़ी से चलने लगा...
एक सज्जन का तेज़ी से पीछा करने लगा...

बेचारे सज्जन भी ये देखकर बड़ा घबराए...
अपने कदम थे उन्होने बड़ी तेज़ी से बढ़ाए...
उनके काँधे पे एक छोटा सा बैग लटका था...
बस उसी मे इस नौजवान का जी अटका था...

सज्जन बैग सीने से चिपकाए ज़ोर से भागे...
लगा शायद नौजवान से निकल गये आगे...
पर वो भी दुगनी रफ़्तार से दौड़ रहा था...
सज्जन का पीछा बिल्कुल न छोड़ रहा था...

सज्जन भागकर तब रेलवे स्टेशन पहुँचे...
बड़ी तेज़ी से थे प्लॅटफॉर्म की ओर लपके...
पर उसने अभी भी उनका पीछा ना छोड़ा...
वो भी उनके पीछे पीछे प्लॅटफॉर्म पे दौड़ा...

लोग तो बस खड़े खड़े तमाशा देख रहे थे...
ओलंपिक जैसी दौड़ से आँख सेंक रहे थे...
फिर पोलीस भी कहीं से सीन मे आई...
नौजवान को पकड़ा और लाठियाँ बजाई...

पर वो सज्जन अभी शायद नही थे थके...
वो तो बस दौड़ते ही रहे और नही रुके..
पोलीस को शक हुआ तो उन्हे भी रोका...
पर वो तो दे गये पोलीस को ही धोखा...

बैग फेंका और वो भीड़ मे कहीं खो गये...
फिर जाने कहाँ वो चुपचाप चंपत हो गये...
बैग खोला तो वहाँ खड़े सब गये सहम..
उसके अंदर रखा हुआ था एक टाइम बम...

फिर तुरंत वहाँ बम निरोधक दस्ता आया...
फिर उन्होने उस बम को फटने से बचाया...
फिर बात चली नौजवान उसी का साथी है...
हो ना हो ये भी ज़रूर कोई आतंकवादी है...

फिर चार लाठियों मे ही वो बिखर गया...
उसके खुलासे से हर कोई था सिहर गया...
बोला मैं कोई आतंकवादी नही सरकार...
मैं तो हूँ बस एक अदना सा बेरोज़गार...

जाने कबसे घर मे था चूल्हा नही जला...
कोशिश की तो पर कोई काम ना मिला....
ये सब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था..
इसलिए एक कोने मे बैठा रो रहा था...

फिर मैने उसे बम रखते हुए देख लिया...
इसीलिए मैं उसके पीछे पीछे हो लिया...
सोचा था कहीं न कहीं तो ये बम फूटेगा...
बस बेरोज़गारी से वही मेरा दामन छूटेगा...

इसके धमाके मे चुपचाप मरने चला था...
परिवार के लिए आज कुछ करने चला था...
मरता तो सरकार से पैसे ही मिल जाते....
मेरे मरने से परिवार के दिन फिर जाते....

वो किसी दामन मे कुछ काँटे सज़ा के आ रहे हैं...बोलकर हमसे गये थे गम भुलाने जा रहे हैं....

Author: दिलीप /


स्वप्न जालों मे फँसे, बिस्तर से जो चिपके पड़े थे...
देख गोली, मूषकों से बिल मे जो दुबके हुए थे...
थी बहुत शर्मिंदगी अंगड़ाइयों को भी मगर...
जागकर भी नींद की डाली खड़े थे थाम कर...

आज लेकिन जोश मे खुशियाँ मनाने जा रहे हैं...
आज आलस छोड़कर ये घर जलाने जा रहे हैं...

रात मे रंगीनियाँ थी, दिन सफेदी मे पुते थे...
और हरदम दूसरों के पाप गिनने मे जुटे थे...
भेड़िया अंदर छिपाये आदमी का स्वांग रचते...
चाल शतरंजी हमेशा आप हम क्या खाक बचते...

आज वो अपना अनोखा फन भुनाने जा रहे हैं...
पंडिताई झाड़ने को सिर मुंडाने जा रहे हैं...

हादसे मे एक, नौकर छोड़ दुनिया चल बसा था...
एक बेटी के सिवा परिवार मे कुछ न बचा था...
पास इनके जब वो आई माँगने कुछ काम को...
है बुलाया कल उसे बिल्कुल अकेले शाम को....

फ़ायदा मजबूरियों का वो उठाने जा रहे हैं...
और हम से कह रहे इक घर बचाने जा रहे हैं...

बेवफा की याद मे मजनूं बने ये घूमते थे...
दर्द मे ये बन शराबी पागलों से झूमते थे...
थे नशे मे चूर आधी रात जब इक घूँट पी थी...
और फिर बन जानवर इज़्ज़त किसी की लूट ली थी...

वो किसी दामन मे कुछ काँटे सजा के आ रहे हैं...
बोलकर हमसे गये थे गम भुलाने जा रहे हैं...