सबकी सुरक्षा का बिल ला रहे हैं वो....

Author: दिलीप /

उनपे जो झेल भूख, खेलें खेल ज़िंदगी का...
धर्म के ज़हर का कहर ढा रहे हैं वो...

महलों को भूख जब सूखे जिस्मों की हुई...
बस्तियों की हड्डियाँ चबा के खा रहे हैं वो...

वादे के बुरादे भरे खोखले चुनावी अब्र...
पाँच साल बाद फिर बरसा रहे हैं वो...

बेड के भी पास 'ज़ेड' रख के बिलों मे रहें...
सबकी सुरक्षा का बिल ला रहे हैं वो....

चुनावी भाषणों में अब, भुना रहे हैं यहाँ..

Author: दिलीप /

सियासी आग के करतब, दिखा रहे हैं यहाँ...
नाखुदा मुझको भंवर में, फँसा रहे हैं यहाँ...

कोई क्लाइमैक्स सिनेमाई चल रहा है अभी...
मौत के बाद मेरी जाँ बचा रहे हैं यहाँ...

मैने कमरों में भर लिए हैं नुकीले पत्थर...
चुनाव आने की खबर दिखा रहे हैं यहाँ...

न मयस्सर हुई है आग जहाँ लाशों को..
सियासी आग का हवन करा रहे हैं वहाँ...

सऊर है नहीं जिनको सड़क पे चलने का...
गाड़ियाँ वो मुल्क़ की चला रहे हैं यहाँ...

जवान भूख ने माँगा जो उनसे काम ज़रा...
उसे चकले का रास्ता दिखा रहे हैं यहाँ...

आज लाशें चला रही हैं रथ सियासत का...
कई परतों में ज़िंदगी, दबा रहे हैं यहाँ...

एक शायर ने तब लिखी थी इन्क़लाबी ग़ज़ल...
चुनावी भाषणों में अब, भुना रहे हैं यहाँ...

आओ मिलकर ज़रा इस पर भी गौर करते हैं...

Author: दिलीप /

मुल्क़ ज़िंदा न फिर हो जाए, ख़ौफ़ रखते हैं...
वो तो लाशों की नुमाइश का शौक रखते हैं...

यहाँ संसद ने तड़पते हुए, दम तोड़ दिया...
वो अपनी बात में ज़हरीला छौंक रखते हैं...

वो जो ऐलान कागज़ी उड़ा रहे हैं अभी...
उसके नीचे छिपी मुहर में मौत रखते हैं....

एक हमले में जो दुबके हुए थे मेज तले...
बदन पे देखो तो खादी का रौब रखते हैं...

जो कई साल से बाँटा किए थे भूख यहाँ...
वो आज हाथ में रोटी का कौर रखते हैं...

यूँ दिल की आग को आँसू से मिटाएँ कब तक...
आओ मिलकर ज़रा इस पर भी गौर करते हैं...

अभी मेरे लिए हिंदोस्तान बाकी है...

Author: दिलीप /

अभी सुलग़ेगा वो कुछ और, शाम बाक़ी है...
हमारे बीच की बातें तमाम बाक़ी हैं...

वो बाँधती है कलावा अभी भी पीपल से...
अभी उस घर में बुढ़ापे का मान बाक़ी है...

जबसे आँगन से उखाड़ी गयी हरी तुलसी...
वो घर रहा ही नहीं, बस मकान बाक़ी है...

उठी बेटी पे जो नज़र बुरी, मिटा दी गयी...
अभी बस्ती में मेरे आन बान बाक़ी है...

आसमाँ छू के रुक गया था परिंदा देखो...
बादलों ने कहा, प्यारे उड़ान बाक़ी है...

फिर से लेने लगा है मुल्क़ मेरा अंगड़ाई...
उसे यकीं है कि बेटे जवान बाकी हैं...

वो काफिला बढ़ा मरते फकीर की जानिब
और फिर लौट गया कह के जान बाक़ी है...

करेंगे बात मज़हबों की कभी फुरसत में...
अभी मेरे लिए हिंदोस्तान बाकी है

जियेंगे कब तलक यूँही गले में फाँस लिए...

Author: दिलीप /

गुज़रे वक़्त की सोहबत में कुछ एहसास लिए...
मैं चल रहा हूँ जाम लेके दिल में प्यास लिए...

मैने नज़मों को रगों में लहू सा दौड़ाया...
ज़िंदगी जी ली शेर पढ़के, बिना साँस लिए...

मैं चल पड़ा हूँ, अपने अश्क़, नज़्म, ग़म लेकर...
न किसी आम की ख्वाहिश न कोई ख़ास लिए...

तेरे शहर की उस गली से आज फिर गुज़रा...
चाँद अब भी वही रहता हो, यही आस लिए...

चमकते कल की जुस्तजू में मैं तो निकला हूँ...
लोग माज़ी की चल रहे हैं, सिर पे लाश लिए...

चलो मिलकर अब नये ख्वाब की बुनियाद रखें...
जियेंगे कब तलक यूँही गले में फाँस लिए...