कुछ लाल रंग का उपयोग कर लिखा है उम्मीद है पसंद आये....हर पंक्ति में लाल शब्द या उससे जुड़े किसी शब्द का उपयोग किया है....एक छोटा सा प्रयोग और आवाहन...
एक समय था लाली अद्भुत आसमान में सजती थी...
सिंदूरी सी सांझ कभी तो भोर लालिमा रहती थी...
मनुज धमनियों मे भी गहरा लाल द्रव्य तब बहता था...
लाल चुनरिया ओढ़ लाज में, चंद्रवदन तब रहता था...
सावित्री तब लाल धार से माँग सजाए रहती थी...
मातायें भी संतानों को लाल लाल ही कहती थी...
लाल मुखी हो जाते थे सब, निर्बल जन जब घुटते थे...
क्रांति क्रांति के स्वर रक्तिम से श्वासों से जल उठते थे..
अंबर का वो लाल रंग अब बस धरती पे सजता है...
धरती माँ का लाल वीर, विश्वासघात से मरता है...
घर की मर्यादा की लाली, व्यापारों मे सजती है...
क्रोध अग्नि वो लाल मुखों की, वो भी फीकी रहती है...
गीदड़ आ कर चाट गये, हैं माँगे लाल नही सूनी...
क्रांति स्वरों की रक्तिंता को, युवा जाति मद मे भूली...
लाल रंग बस धू धू करते, जलते घर मे मिलता है...
पुष्प नहीं अब लाल प्रेम का, नागफनी ही उगता है....
अब तो गीली आँखों मे कुछ रक्तिम से अंगार भरो..
जल से भरी धमनियों मे कुछ लाली का संचार करो...
कालिख से तो अच्छा ही है, लाल सदा इतिहास रहे...
लाली पूरब की ना खोए, नवजीवन का श्वास बहे...


