लाली पूरब की ना खोए, नवजीवन का श्वास बहे...

Author: दिलीप /


 कुछ लाल रंग का उपयोग कर लिखा है उम्मीद है पसंद आये....हर पंक्ति में लाल शब्द या उससे जुड़े किसी शब्द का उपयोग किया है....एक छोटा सा प्रयोग और आवाहन...

एक समय था लाली अद्भुत आसमान में सजती थी...
सिंदूरी सी सांझ कभी तो भोर लालिमा रहती थी...
मनुज धमनियों मे भी गहरा लाल द्रव्य तब बहता था...
लाल चुनरिया ओढ़ लाज में, चंद्रवदन तब रहता था...

सावित्री तब लाल धार से माँग सजाए रहती थी...
मातायें भी संतानों को लाल लाल ही कहती थी...
लाल मुखी हो जाते थे सब, निर्बल जन जब घुटते थे...
क्रांति क्रांति के स्वर रक्तिम से श्वासों से जल उठते थे..

अंबर का वो लाल रंग अब बस धरती पे सजता है...
धरती माँ का लाल वीर, विश्वासघात से मरता है...
घर की मर्यादा की लाली, व्यापारों मे सजती है...
क्रोध अग्नि वो लाल मुखों की, वो भी फीकी रहती है...

गीदड़ आ कर चाट गये, हैं माँगे लाल नही सूनी...
क्रांति स्वरों की रक्तिंता को, युवा जाति मद मे भूली...
लाल रंग बस धू धू करते, जलते घर मे मिलता है...
पुष्प नहीं अब लाल प्रेम का, नागफनी ही उगता है....

अब तो गीली आँखों मे कुछ रक्तिम से अंगार भरो..
जल से भरी धमनियों मे कुछ लाली का संचार करो...
कालिख से तो अच्छा ही है, लाल सदा इतिहास रहे...
लाली पूरब की ना खोए, नवजीवन का श्वास बहे...

अरे, उन क्लब वालों की ज़िंदगी मे भूलने को इतना गम ही कहाँ है...

Author: दिलीप /

एक पुरानी रचना थोड़े संपादन के साथ फिर से पेश कर रहा हूँ शायद आप सभी को पसंद आये....
थके हुए बल्ब की मद्धम रोशनी मे...
किसी के लिए चमक का एहसास हूँ...
देसी शराब की एक देसी दुकान मे...
कोने मे पड़ा स्टील का गिलास हूँ...

जाने रोज़ कौन कौन चले आते हैं...
फिर होंठों से मैला कर चले जाते हैं...
फिर किसी छोटू के हाथ बढ़ते हैं...
मुझे एक चुल्लू पानी से चमकाते हैं...

मेरी एक काँच की बहेन भी थी...
ग़रीब था, तो छोड़कर चली गयी...
अब किसी बड़े से विदेशी क्लब मे...
काँच की अलमारियों मे है सजी...

अभी ठीक से जवान भी नही हुई...
पर सैकड़ों होंठों पे रोज़ सजती है...
चमकती रोशनियों के उजाले मे...
चमकती है और बहुत हँसती है...

शायद कमाल है पीने वालों का...
अभी तक उसकी इज़्ज़त बची है...
मेरे चमकते स्टील की चमक तो...
न जाने कबकी कहीं खो चुकी है...

उसके मन मे तो गहराई भी नही...
फिर भी उसपे फलों की सजावट है...
एक मैं, इतना गहरा हूँ फिर भी...
बाहर बस पसीने की लिखावट है...

पर गम नही इस बात का क्यूंकी...
जो यहाँ रोज़ बैठा मैं देखता हूँ...
आँसू, दुख, तकलीफ़ सब बातें...
अनुभव की तरह उसे सहेजता हूँ...

और अब अच्छे से समझता हूँ...
गहराई की ज़रूरत तो बस यहाँ है...
अरे, उन क्लब वालों की ज़िंदगी मे...
भूलने को इतना गम ही कहाँ है...

आँगन के कोने मे गुपचुप तुलसी सी उग जाती अम्मा....

Author: दिलीप /

आज फिर माँ को समर्पित एक रचना लिख रहा हूँ...सूर्यकांत जी इस बार ये कहने का प्रयास किया है कि माँ अगर साथ न भी हो फिर भी कहाँ कहाँ है माँ...अपनी माँ, आपको और अर्चना जी को समर्पित है ये रचना....


चला जो मुश्किल राह साथ मे चलती सी मिल जाती अम्मा...
दुख का कभी बवंडर आए आगे खुद बढ़ जाती अम्मा...

यादों का ये भरा पिटारा जब धीरे से चुक जाता है...
कुछ बासी तो कुछ कुछ ताजी यादों सी बन जाती अम्मा...

बहुत ज़ोर की भूख लगे पर बस इक रोटी का टुकड़ा हो...
किसी पिघलते मक्खन जैसी रोटी मे घुल जाती अम्मा...

बड़े घराने ब्याही बेटी फिर भी जब मिलने आती है...
आँचल के कोने मे दुबका मुड़ा नोट बन जाती अम्मा...

जब आँगन सूना सूना हो, परदेसी अपने हो जायें...
दरवाज़े पे टिमटिम करते दीपों सी जल जाती अम्मा...

कभी कभी जब छुटकी मेरी बड़ी बड़ी बातें करती है...
नन्हे से उगते दातों मे तुतलाती मिल जाती अम्मा...

कभी मुश्किलें आते आते सहमी सहमी टल जाती है...
कभी अंगूठी ताबीजों मे छिपी हुई दिख जाती अम्मा...

तपती जलती धरती पर जब अम्बर दो बूंदे बरसाए...
आँगन के कोने मे गुपचुप तुलसी सी उग जाती अम्मा....

है ये पल भर की चाँदनी, कल फिर रात है...

Author: दिलीप /


सेठ जी चादर ताने सोए पड़े थे...

लक्ष्मी जी के स्वप्न मे खोए पड़े थे...

तभी उनका बेटा झूमते हुए आया...

और सेठ जी को हिला हिला के जगाया...

फिर बोला उठो मुझे कुछ बताना है...

कल मुझे भी अपना जन्मदिन मनाना है...

लक्ष्मी जी पे हमला सेठ जी कैसे सहते...

पर इससे पहले की मना करने के लिए कुछ कहते...

तभी बेटे ने कुछ ऐसी कथा सुनाई...

सेठ जी की बुद्धि भी थी चकराई...

'स्कूल का माली कल क्लास मे आया था...

बच्चे के जन्मदिन पे पूरा स्कूल बुलाया था...

शाम को घर भी खूब सजाया था...

हलुआ, पूरी, खीर, जाने क्या क्या खिलाया था...

जो भी लौटे  उसके चेहरे खिले थे...

सब बच्चों को वहाँ खिलौने भी मिले थे'...

जाने ये भगवान की कैसी थी माया..

सेठ जी ने सोचा पर समझ नही आया...

वैसे भी जब ग़रीब पेट भर खाने लगते है...

अमीर की छाती पे साँप लोटने लगते हैं...

और फिर ग़रीब है ग़रीबी बघारे...

हमारे बच्चों को तो ऐसे ना बिगाड़े...

बस यही सोच, सेठ जी उठ गये...

माली के घर की ओर चल पड़े....

उस टूटे घर पे अब भी बत्तियाँ सजी थी...

कल रात की रौनक अब भी बची थी...

सेठ जी को देख माली हर्षाया...

बड़े आदर से उन्हे बाहर कुर्सी पे बिठाया...

फिर अपनी पत्नी को आवाज़ दे चाय मंगाई...

फिर सेठ जी के लिए खीर भी बनवाई...

सेठ जी का तो दिल ही बैठा जा रहा था...

वो चमक देख, मुँह ऐंठा जा रहा था...

सेठ जी फिर खीर मे मेवे देख नही पाए...

पूछते पूछते बड़ा सकूचाए...

आज कल घर मे रौनक बड़ी है...

क्या कोई लॉटरी निकल पड़ी है...

माली अचानक खामोश हो गया...

पल भर मे सारा जोश खो गया...

बोला बेटा जन्मदिन मनाने की ज़िद कर रहा था...

मैं भी जाने कबसे मना कर रहा था...

ग़रीब हैं हम, उससे कितनी बार कहा था...

पर बेटा था कि मान ही नही रहा था...

फिर जब बच्चे के आँसू नही देख पाया...

कल गया और अपनी किडनी बेच आया...

आप क्यूँ घबराते हैं, कुछ दिन की बात है...

है ये पल भर की चाँदनी, कल फिर रात है...

लखनऊ के ब्लॉगर मित्रों से एक अनुरोध...

Author: दिलीप /

नमस्कार मित्रों...

इस समय अपने गृहस्थान लखनऊ में हूँ...और लखनऊ के ब्लॉगर मित्रों से एक अनुरोध है कि अगर उनके पास कुछ प्रकाशन केन्द्रों कि जानकारी हो तो कृपया जरुर बताएं...और किसी पुस्तक के प्रकाशन सम्बन्धी हर प्रकार की जानकारी का भी स्वागत है...और हाँ अपनी रचनाओं के अधिकार कैसे प्राप्त किये जाते हैं इस समबन्ध में भी जानकारी का स्वागत है...

सधन्यवाद
दिलीप