मोहिनी माया के चंगुल मे फँसा, बिखरा, बँटा,
मूल कर्तव्यों की रेखा से कभी का तू हटा,
अनवरत संघर्ष का क्रम है सतत बस चल रहा,
भाग्य पर सब छोड़ के तू क्यूँ स्वयं को छल रहा,
तू स्वयं की सोच से भीषण कोई संग्राम कर ले,
विनती तुझसे है मेरी,हे मन! ठहर, विश्राम कर ले..
बाण तेरी शक्ति के सब क्षीण होकर गिर रहे है,
देख घन दुर्भाग्य के चहु ओर तेरे घिर रहे है,
पथ जिसे तू चुन चुका है, उससे तू अज्ञात है,
तू जिएगा या मरेगा, क्या तुझे यह ज्ञात है?
क्षण भर तनिक दुविधा का अपनी, बैठ कर संधान कर ले,
विनती तुझसे है मेरी,हे मन! ठहर, विश्राम कर ले..
चार दिन जीवन के थे और दो तो यूँही कट गये,
वासना व लालसा मे वो बराबर बँट गये,
पुष्प जो मुरझा चुके, वो ना खिलेंगे अब कभी,
पर तेरे पुरुषार्थ क्या बिकते रहेंगे सब यूँही,
ज्ञान चक्षु खोल के तू स्वयं का कल्याण कर ले,
विनती तुझसे है मेरी,हे मन! ठहर, विश्राम कर ले..
ले सुदर्शन चक्र कर मे, वेदना सब छिन्न कर,
तू स्वयं को विश्व के सब प्राणियों से भिन्न कर,
लक्ष्य कोई सार्थक सा अब हृदय मे साध ले,
तू भटकती सोच को एकाग्र होकर बाँध ले,
तू त्याग कर सब मोह अब नर से स्वयं को राम कर ले,
विनती तुझसे है मेरी,हे मन! ठहर, विश्राम कर ले..
24 टिप्पणियाँ:
Bahut khoob , Baant ko bant kar deejiye
लक्ष्य कोई सार्थक सा अब हृदय मे साध ले,
तू भटकती सोच को एकाग्र होकर बाँध ले,
ऐसा लिखने वाले की लेखनी को सलाम
भगत सिंह को अपना आदर्श मानता हूँ..और उम्मीद है एक दिन अपने राष्ट्र के लिए कुछ न कुछ अवश्य कर सकूँगा....
कविता के साथ-साथ आपके विचार भी बहुत अच्छे लगे...
तू त्याग कर सब मोह अब नर से स्वयं को राम कर ले,..............बस इसमे बहुत कुछ कह गए............
काश मन ठहर जाना सिख लेता तो जीन कुछ आसान हो जाता.........
एक एक शब्द उत्कृष्ट , इसी एकाग्रता का तो अभाव है
ले सुदर्शन चक्र कर मे, वेदना सब छिन्न कर,
तू स्वयं को विश्व के सब प्राणियों से भिन्न कर,
लक्ष्य कोई सार्थक सा अब हृदय मे साध ले,
तू भटकती सोच को एकाग्र होकर बाँध ले,
बहुत सुन्दर और प्रेरक रचना ...
........प्रेरक रचना ...
sabhi ka is protsahan ke liye abhaar...
man ko vishraam kahaan hai
aur yadi vishraam kar leta hai
to shrishti ke aayaam kahaan hain
man chalta rahe bhatakna nahi chahiye
kuvichaar chhod, suvichaar man me chalte rahnaa chahiye
aur aapki kavita ke liye visheshan ke shabd dhoondhne pad rahe hain. umda...
waah Surykaant ji bahut sundar...abhaar...
लक्ष्य कोई सार्थक सा अब हृदय मे साध ले,
तू भटकती सोच को एकाग्र होकर बाँध ले,
...ईश्वर करे कि आपकी कलम से इसी प्रकार अच्छी रचनाओ का स्रजन होता रहे
Bandar ki tarah is daal se us daal pe koodne wala man,gar zara qabu me aa jaye to ham saadhu na sahi,saadhak ban jayen!
Behad paripakv khayalat hain aapke! Abhibhoot hun!
बहुत सुन्दर . मन बेशक विश्राम करे पर दिल की कलम अनवरत चलती रह
अब नर से स्वयं को राम कर ले..
वाह वाह... कितना सुन्दर लिखा है....
सुन्दर---भावनाओं और सन्देश का अनोखा संगम्।
सुंदर रचना के लिए बधाई
बहुत सुन्दर और प्रेरक कविता लिखी, दिलीप जी, बधाई।
आध्यात्म और दार्शनिकता से ओत-प्रोत एक सुंदर कविता! आज की आपाधापी वाली जिंदगी के लिए एकदम प्रासंगिक।
bahut suder, dilipji
http://sanjaykuamr.blogspot.com/
बहुत सुन्दर रचना!
बहुत सुन्दर रचना!
मनोभावों की बेहतरीन अभिव्यक्ति, धनवान लेखनी और अच्छा दिल ...शुभकामनायें !
राजनेताओं को किन्नर कह कर उनकी बेइज्जती क्यों करते हो, दिलीप भाई? प्रस्तुति बेहद सुन्दर! बधाई।
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