किन्नर और हम...अंतर क्या???

Author: दिलीप /

शुरुआत में किसी का कुछ दर्द रखने का प्रयास किया और अंत की पंक्ति में अपने दिल का दर्द रखने का प्रयास किया.... अगर किसी को ठेस पहुंचे तो मैं क्षमा चाहूँगा....


मिला एक शारीरिक विसंगति रूपी श्राप...
उनका जन्म लेना ही है बन जाता इक पाप...
कर्कश बजती तालियाँ और ढोलक की थाप...
बंजारों सा जीवन न माँ है न ही बाप...

समाज की हेय दृष्टि का तीखा सा डॅंक...
माथे पे लगा हुआ है उद्दन्डता का कलंक...
कोई भेद नही करते कोई राजा हो या रंक...
आँचल तो हैं, पर सूने ही रह गये अंक...

जो कभी कोई साथी इनका अपना है मरता...
देते हैं अपशब्द उसे फिर उत्सव है मनता...
जब इतनी मिलती है कठिनाई और विषमता...
फिर कहाँ से आती है इनमे ऐसी निर्भयता...

क्यूँ अपूर्णता पे भी इन्हे ऐसा अभिमान है...
मुख पे अपशब्द तो हृदय मे वरदान हैं...
अपने सामाजिक कर्तव्यों का इन्हे ग्यान है...
समाज मे मिला एक अपना अलग स्थान है...

ये कोई और नही ये तो अभागे किन्नर हैं...
और हममे और इनमे एक बहुत बड़ा अंतर है...
ये अपनी पौरुषहीनता ताल ठोककर मानते हैं...
और हम अपनी मानते नही हैं पर जानते हैं...


21 टिप्पणियाँ:

kshama ने कहा…

Bahut sahi kaha! Mai khud aksar hairaan ho jaatee hun,jab padhe likhe log, inkaa mazaaq udate hain! Inhen naukri bhi to nahi milti,to kinar karen to kya karen?

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

वाह!! बहुत सुन्दर रचना है दिलीप जी। बधाई स्वीकारें।

ये कोई और नही ये तो अभागे किन्नर हैं...
और हममे और इनमे एक बहुत बड़ा अंतर है...
ये अपनी पौरुषहीनता ताल ठोककर मानते हैं...
और हम अपनी मानते नही हैं पर जानते हैं...

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

प्रक्रिति प्रदत्त अभिशाप। हम जैसे साधारण मानव हँसकर अपना मनोरन्जन कर लेते हैं और क्या। साधारण मानव का स्वभाव भी तो प्रक्रिति प्रदत्त है। ये तो हुई किन्नरो को देखकर हँसने की बात। यहाँ तो किसी व्यक्ति विशेष की किसी भी प्रकार की विसंगति हो बोलने का ढंग चलने का ढंग तब भी हँसा जाता है तब तक जब तक कि वह अपनी स्थिति का सही आँकलन न कर ले। बहुत ही सुन्दर चित्रण।

nilesh mathur ने कहा…

वाकई बहुत बड़ा अंतर है, अच्छी रचना !

Jandunia ने कहा…

इस पोस्ट के लिेए साधुवाद

शिवम् मिश्रा ने कहा…

"ये कोई और नही ये तो अभागे किन्नर हैं...
और हममे और इनमे एक बहुत बड़ा अंतर है...
ये अपनी पौरुषहीनता ताल ठोककर मानते हैं...
और हम अपनी मानते नही हैं पर जानते हैं..."


एक कटु सत्य कहा है तुमने मेरे भाई ! आभार !

देव कुमार झा ने कहा…

दिलीप भाई,
मां सरस्वती की कृपा है तुम पर, कितना अच्छा लिखते हो।

Babli ने कहा…

बहुत ही सुन्दरता से आपने हर एक शब्द लिखा है! मैं जब भी किन्नर को देखती हूँ तो बहुत दुःख होता है ये सोचकर की वो कितने लाचार हैं जो नौकरी नहीं कर सकते! कुछ लोग तो किन्नर को लेकर मज़ाक उड़ाते हैं पर वो बेचारे करें भी तो क्या करें?

दिलीप ने कहा…

wo to fir bhi swaabhimaani hain ham jo napunsak bhaanti har anyaay dekh kar bhi chup baithe hain...ham kab sudhrenge...

shikha varshney ने कहा…

SUPERB.......

संजय भास्कर ने कहा…

........एक कटु सत्य कहा है आभार !

Udan Tashtari ने कहा…

भावपूर्ण..

आचार्य उदय ने कहा…

दिलीप जी
बेहद प्रसंशनीय रचना,
बधाई,
आचार्य उदय

kunwarji's ने कहा…

हमारे दैनिक जीवन में कुछ ना कुछ ऐसा होता है जो हमें कुछ सोचने पर मजबूर कर ही देता है...आप उस मज़बूरी से भी लाभ उठा लेते हो,ऐसा ही लगता है आपकी रचनाये पढ़ कर....मार्मिक प्रस्तुति...

कुंवर जी,

वन्दना ने कहा…

ek aur marmik prastuti.

Shekhar Kumawat ने कहा…

आभार इस कविता को प्रस्तुत करने का..अच्छी पोस्ट!

aarya ने कहा…

सादर वन्दे !
जीवन का खालीपन क्या है,
तुम जाकर उनसे पूछो,
तुम जाकर देखो अपौरुषता में भी
कैसे खुश होकर ढोल बजाये जातें है
हँस देते हैं! हमें लाज आती,
अपनी इस किन्नरता पर
देख ओ पौरुषधारी कैसे दुःख में भी थाल सजाये जातें हैं
फिर क्यों हम साधारण और वो किन्नर कहलाये जाते हैं |
रत्नेश त्रिपाठी

anjana ने कहा…

अच्छा लिखते हो। अच्छी भावपूर्ण पोस्ट....

मेरा शनि अमावस्या पर लेख जरुर पढे।आप की प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा ....आभार
http://ruma-power.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

तुम्हारी लेखनी की धार बहुत तेज है..... हर रचना दिल को छूती है....

rashmi ravija ने कहा…

antim pankti to bemisaal hai...bahut hi prabhaavi rachna..

सुलभ § Sulabh ने कहा…

दिलीप, तुम्हारी ये रचना दिल को छू गयी. बहुत अपनेपन से ये बात टिप्पणी में कह रहा हूँ.

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