ताज़ी नज़्म पकाते हैं...

Author: दिलीप /

आओ दिन के फ़र्श पे दोनों रात बिछाते हैं...
चाँद अंगीठी जला के ताज़ी नज़्म पकाते हैं...

थोड़ा सा एहसास गूँथ लो, कल ही पिसवाया हैं...
ग़म के फिर चकले बेलन पर उसे घुमाते हैं...

पिछली बार की जो ग़ज़लें बाँधी थी मैने ख़त में...
चलो उसे चखने से पहले कुछ गर्माते हैं...

खट्टी बादल की चटनी या तारों की शक्कर से...
तोड़ तोड़ कर एक निवाला चाव से खाते हैं...

वो जो ऊपर रात की रानी उड़ती रहती है...
चलो उसे भी प्याले मे भर ओस पिलाते हैं...

ज़रा ओस फिर हम पी लें और थोड़ी मदहोशी में...
चलो ओढ़ कर हवा सुहानी हम सो जाते हैं...

आओ दिन की फ़र्श पे दोनों रात बिछाते हैं...
चाँद अंगीठी जला के ताज़ी नज़्म पकाते हैं...

6 टिप्पणियाँ:

शारदा अरोरा ने कहा…

आओ दिन की फ़र्श पे दोनों रात बिछाते हैं.' दिन की ' जगह दिन के होता है ...बहुत सुन्दर गीत रचा है ..बधाई ...

दिलीप ने कहा…

Shukriya Sharda ji galti sudhar li gayi hai :)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रचनाकारी तेल उबालें, पूड़ी भी तल लाते हैं

बहुत खूब

इमरान अंसारी ने कहा…

वाह ....वाह.....वाह........अब लफ्ज़ नहीं है और.... वाह

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

वाह!!! बहुत बढ़िया | आनंदमय | आभार

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Shalini Rastogi ने कहा…

अच्छी गज़ल पकी है ...बहुत खूब!

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