एक डायरी का दर्द...

Author: दिलीप /


 काफी लम्बी है पर कुछ ऐसा था दिमाग में जो लिखता ही रहा...लम्बाई के लिए माफ़ी चाहूँगा...
मुझमें जान नहीं, पर किसी की उम्र का एक टुकड़ा चखती हूँ...
कोरे काग़ज़ों, कुछ गीले पन्नों को खुद में सम्हाले रखती हूँ...
मैं किसी की ज़िंदगी, तो किसी का गीत, तो किसी की शायरी हूँ...
कुछ सिसकते दर्द, कुछ हंसते पल समेटे, मैं एक डायरी हूँ...

आज फिर कोई भूत, भविष्य, वर्तमान के सपने बुन रहा था...
मेरा हृदय, मेरे पन्नो मे सिमटी, उसकी कहानी सुन रहा था...
आज पच्चीस सालों बाद, हम दोनों का परिवार बढ़ चुका था...
जाने मेरे पन्नों पे,सफलता की कितने किस्से गढ़ चुका था...

उसके सपने, उसके दिल की तरह भोले, मासूम और प्यारे थे...
उन्हे पूरा करने के लिए जाने कितने हान्थपाँव मारे थे...
उसके दिल की दुनिया बस उसकी बीवी और दो प्यारे से बच्चे थे...
खुशहाल था वो परिवार, उनके प्यार के वो मोती सच्चे थे...

पर तेज रफ़्तार से आकर, फिर निकल, ये सुख का घोड़ा जाता है...
और पीछे उसकी दुम को पकड़े, दुख दौड़ा दौड़ा आता है...
ये पैसे की कमी, आदमी को कितना बेचैन,हताश कर देती है...
इसकी निशानी मैने अपने फटे पड़े, मुड़े पन्नों मे देखी है...

मेरे काग़ज़ों के फटने का दौर कुछ दिन तक यूँही चलता रहा...
फिर कई दिनों तक, अपनी कलाम मे वो क़र्ज़ की स्याही भरता रहा...
पर उसे क्या पता था, ये हालाती आँधियाँ कहाँ थम पाती है...
अगर क़र्ज़ की स्याही भरो, तो कलाम को उसकी आदत पड़ जाती है..

ज़रूरतों के मुँह अब बस क़र्ज़ के निवालो से ही भर रहे थे...
उसकी उम्र के साथ साथ क़र्ज़ के दानवी पंजे भी बढ़ रहे थे...
पर एक छोटे से कारोबार से उसे कुछ सहारा मिल रहा था...
उस क़र्ज़ की मार से फटे, खुद के चीथदों को वो सिल रहा था....

पर उपर बैठे भगवान को कब इन मजबूरों पे दया आती है...
ये मुसीबतें तो मेरी तारीखों की तरह बस बढ़ती जाती है...
बिल, बच्चों की फीस, जाने कितनी परेशानियाँ उसे सता रही थी...
उसका हर दुख, वो कलम, मुझे अपने गीलेपन से जता रही थी...

मार्च का महीना था, अब होली के रंग दस्तक देने ही वाले थे...
पर यहाँ उन हमराहियों मे रंग कहाँ, वो दिल तो बस काले थे...
पर एक दिन, मासूमियत ने उठ, कुछ नये कपड़ों की ज़िद कर दी...
उन कोने से फटे चीथड़ो ने, तो मेरी आँखें भी नम कर दी...

मासूम नन्ही आँखों को कैसे समझाता अपनी मजबूरियाँ...
खिलाता रहा वो उन्हें झूठ का नमक लगा दिलासे की पूरियाँ...
मुझमें तारीख के साथ साथ गीलापन बढ़ता ही जा रहा था...
और क़र्ज़ का बोझ उस लाचार के सिर पे अब चढ़ता ही जा रहा था...

एक दिन अचानक उस मजबूर के दरवाज़े पे ज़ोर की दस्तक हुई...
दरवाज़ा खोला तो उम्मीद के उस ताबूत मे एक कील और धँसी...
अब तो रोज़ क़र्ज़ की रकम माँगने वाले उसके घर आने लगे...
कुछ प्यार से माँगते तो कुछ वसूली के लिए धमकाने लगे...

अब ये बोझ ना मैं सह पा रही थी ना वो खुद ही सह पा रहा था...
और अपने सीने मे छुपा दर्द वो किसी से ना कह पा रहा था...
पूरा एक दिन वो बस मुझपे आजीबो ग़रीब चित्र बनता रहा...
मस्तिष्क मे उठते तूफान की कथा इसी तरह मुझे सुनाता रहा...

काश उन चित्रों को समझ पाती, पर समझ के भी क्या कर पाती...
कहाँ मैं उठ के अपने हान्थो से उसे थाम, उसे संहाल पाती...
पर जाने क्या हुआ वो चित्र मुझसे उसकी आख़िरी कहानी कह गये...
उस दिन के बाद से मेरे कुछ काग़ज़ कोरे के कोरे ही रह गये...

पर अच्छा ही हुआ उसने उसे लिखा नही, अगले दिन मैने जो देखा ...
उसने एक अजीब तरकीब निकाली बदलने को, अपनी किस्मत का लेखा...
आज वो घर आया तो वो खुश था उसकी आँखों मे चमक थी...
उसकी आवाज़ मे आज पहले जैसा कोई ठहराव था, कोई खनक थी...

कल जो अपनी मायूसी मे, मजबूरी मे, परेशान हो पगलाया था...
आज वो बच्चों के लिए नये कपड़े, बीवी के लिए साड़ी लाया था...
बोला अब हमारा सारा दुख, सारी तकलीफें दूर हो जाएँगी...
अब फिर से एक बार हमारे दरवाज़े से होके खुशियाँ आएँगी...

अपनी नन्ही गुड़िया से बोला आज हम तुम्हारा जन्मदिन मनाएँगे...
आज फिर से खूब सारी मस्ती करेंगे मिलके सारा केक खाएँगे...
फिर एक प्लेट में, अपने दिल से भी बड़ा एक केक वो लेकर आया...
फिर पूरे परिवार ने उसे मिल के काटा, और बहुत चाव से खाया...

आज दोनो हमसफ़र बहुत खुश थे उनकी आँखों मे नमी थी...
बस अब उसकी कलम के उठने और उसके मुझपे चलने की कमी थी...
मैं सोच ही रही थी कि वो बाहर गया और दरवाज़ा बंद कर लिया...
कुछ समझ नही आया पर आज शैतान ने अपना काम कर दिया...

वो दोनो मासूम और उसकी बीवी तड़प तड़प के चिल्ला रहे थे...
वो बच्चे बार बार दर्द मे बस पापा पापा ही बुला रहे थे...
पर वो दरवाज़ा नही खुला और यहाँ बदल सारा मंज़र गया...
उस मजबूर का वो पूरा परिवार तड़पते तड़पते वही मर गया....

सब खामोश था, तभी दरवाज़े के खुलने ने सन्नाटा तोड़ा...
इक बाप तड़पते तड़पते रेंगते, अपने बच्चों की ओर दौड़ा...
उनके गालों को चूमते चूमते वो एक बार ज़ोर से चिल्लाया...
फिर उन सबको उठा, पास के बिस्तर पे, आराम से लिटा, सुलाया...

फिर बहती आँखों संग तड़पते तड़पते वो भी उनमें खो गया...
फिर शायद सदा के लिए पूरा परिवार वहीं बिस्तर पे सो गया...
मैं कुछ समझ नही पा रही थी,मैं उस पूरी रात बस रोई...
मेरे सामने कुछ प्यार लुटा था, एक प्यारी सी दुनिया थी खोई...

पर सुबह एक बार फिर मैने अपने दिल की कली को खिलते देखा...
जब उस मजबूर बेचारे को उस बिस्तर पर धीरे से हिलते देखा...
सोचा शायद अभी सब फिर से उठ कर खुशियाँ मनाएँगे...
फिर से वो मिल के झूमेंगे, खुशियों से भरे गीत गाएँगे...

पर मुझे क्या पता था उस प्यारे से केक मे मिला ज़हर था...
वो मजबूरी का, मायूसी का, एक परिवार पे टूटा कोई क़हर था...
उस ज़हर ने उस मजबूर पे जाने क्यूँ असर नही दिखाया था...
वो जब धीरे से उठा तो वो सारा मंज़र देख नही पाया था...

पागल सा पूरे कमरे मे इधर उधर घूम, चिल्ला रहा था...
कभी अपनी बीवी, तो कभी बच्चों को सीने से लगा रहा था...
आज फिर भगवान ने जाने ये मज़ाक किया, या कोई खता की...
उसकी ये बेमानी ज़िंदगी, उस मजबूर के लिए सबसे बड़ी सज़ा थी....

वो बार बार सबको चूम चूम कर, ज़ोर ज़ोर से रो रहा था..
उसका दर्द देख कर बता नही सकती, मुझे कितना दर्द हो रहा था...
वो कभी चादर को सहेजता, फिर कभी इधर उधर देखने लगता...
कभी सब कुछ निहारता, और ज़ोर से रोने लगता, चीखने लगता...

जाने कितने पछ्तावे के फन्दो मे अब वो बेचारा कसने लगा...
रोते रोते थक गया और फिर अचानक पागलों की तरह हँसने लगा...
एक बार सबको जगाने की कोशिश करता, फिर उन्हे मार रहा था...
शायद अपनी ग़लतियों का गुस्सा, अब उन लाशों पे उतार रहा था...

वो वहशी सा पागल सा, चीज़ों को इधर उधर बिखराने लगा...
फिर मन ही मन कुछ बड़बड़ाते हुए दरवाज़े से बाहर जाने लगा...
फिर पता नही चला, वो अब कहाँ था, ज़िंदा भी था, या मर गया...
पर जो उसने किया, वो मेरे लिए एक बड़ा सवाल खड़ा कर गया...

क्यूँ पैसे की कीमत अब इतनी बढ़ गयी, कि ज़ंदगी सस्ती हो गयी...
क्यूँ इन चंद कौड़ियों की दौड़ मे फ़ना इंसान की हस्ती हो गयी...
क्यूँ पैसे की खातिर खून होते हैं, और बहुएँ जला दी जाती है...
क्यूँ पैसे के लिए बाप का प्यार, माँ की ममता भुला दी जाती है...

इंसानी रिश्तों की मजबूती भी, क्या अब बस इन पैसों की मोहताज है...
क्या अब हर दिल में हर दिमाग़ मे, बस इन्हीं कौड़ियों का ही राज है...
कब तक ये रंगीन काग़ज़ के टुकड़े, आदमी का सौदा करते रहेंगे...
और ये बेचारे इंसान, इनके बिना भूख, से ऐसे ही मरते, सडते रहेंगे...

13 टिप्पणियाँ:

kshama ने कहा…

Aap behad achha likhte hain...sirf aaj laga ki kuchh lamba tha,halanki har lafz har pankti lajawab hai,is me shak nahi.

मो सम कौन ? ने कहा…

हमेशा की तरह लाजवाब।

बेहद मार्मिक।

Shekhar Suman ने कहा…

ohhh aapki yeh kavita ne to kavya ka roop le liya hai...
lekin hamesha ki hi tarah bahut hi khubsurat rachna.....
umdaah prastuti...
mere blog par is baar..
पगली है बदली....
http://i555.blogspot.com/

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

कर्ज के बोझ तले दबे आम आदमी की यही व्यथा है. लम्बी लेकिन सुन्दर कविता.

anoop joshi ने कहा…

kavita nahi kavya sangrah hai sir ye.khoob..

वन्दना ने कहा…

दिलीप जी,
आज की रचना के लिये तो शब्द भी कमजोर पड गये हैं……………इंसानी ज़िन्दगी की सबसे कडवी सच्चाई है ये कि आज के दौर का भगवान पैसा बन गया है शायद। जिसके आगे हर रिश्ता बेमानी हो गया है इसीलिये रिश्तो को ताक पर रख दिया जाता है फिर चाहे कोई भी रिश्ता क्यो ना हो।
बेहद संवेदनशील रचना।

शारदा अरोरा ने कहा…

दर्दनाक , कविता में पूरी कहानी कह दी है , जिन्दगी को हर कीमत पर चलना चहिये , ये किन्हीं कमजोर पलों के फैसले होते हैं ...जो बस निशब्द कर जाते हैं ।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

daayri poori jivant ho uthi hai dilip ..bahut dino baad padh paya tumhe dost...pahle tum gayab ho gaye the..fir main ....:)

Udan Tashtari ने कहा…

मार्मिक...अभी लगता है फिर फिर पढ़ना होगी.

Mithilesh dubey ने कहा…

कई बार पढ़ा भईया , दिल को छू गई आपकी ये रचना ।

ललित शर्मा-للت شرما ने कहा…

वाह दिलीप जी,बेहतरीन,पढ कर आनंद आ गया। दिल को छुती हूई रचना। ब्लाग नाम को सार्थक करती हुई रचना के लिए आभार--श्रावणी पर्व की बधाई

लांस नायक वेदराम!---(कहानी)

shikha varshney ने कहा…

है तो वाकई बड़ी ..पर इतनी सहजता और प्रवाह है इस रचना में कि बिना रुके पूरा पढ़ गई
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

सुमन'मीत' ने कहा…

ये डायरी ही तो सच्चा साथी होती हैं ......................कभी साथ नहीं छोड़ती.......

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