कल शायद मुझे वो दिखाई दी...
हाँ वही तो थी, सड़क के उस पार खड़ी...
हम दो किनारों के बीच वो काली नदी,
जिसमें मीलों की रफ़्तार से छोटी बड़ी लहरें गुज़र
रही थी...
उसका बदन कुछ भर गया था, जैसे सर्दियों का उगता सूरज...
वक़्त के सुनार ने, बालों के रेशम में, थोड़ी चाँदी
जड़ दी थी...
चेहरे की रेत पर, कुछ गुज़रे सालों ने अपने निशान
छोड़े थे...
छोटी छोटी बूटियों वाली साड़ी...
जैसे जब सुबह ने आने से पहले जब चादर झाड़ी हो...
तो सितारे छिटक कर उसके आँचल मे आ गये हों...
और चाँद गिर कर अटक गया हो माथे पर...
हाँ वही तो थी,
क्यूंकी पीले रंग की चूड़ियाँ थी उसके हाथों मे...
उसकी साड़ी को मैच नहीं करती थी...
पीला रंग मुझे बहुत पसंद था...
सोचा नदी मे छलाँग लगा ही देता हूँ...
फिर सोचा मुझे पहचान पाएगी वो...
चेहरे पे ज़ीब्रा क्रौसिन्ग सी झाड़ियाँ, बालों मे
चूने की पुताई...
मिडिल क्लास घर जैसी हालत थी मेरी...
खैर हिम्मत जोड़ी और बढ़ गया उस ओर...
आज एक किनारा दूसरे किनारे से मिलने वाला था...
उसने भी मुझे देखा...
उसकी आँखों मे नमी देखी, या शायद मेरी आँखें दबदबा
गयी थी...
पता नहीं, पर वही तो थी...
उसकी उँगलियाँ आपस मे जाने क्या बातें कर रही थी...
नर्वस थी वो शायद...
मैं उस तक पहुँचता कि उसने कदम दूसरी ओर बढ़ा दिए...
कदम मे इंतेज़ार सी रफ़्तार थी..धीमी बहुत धीमी...
मैं समझ गया ये वो नहीं है...
हाँ,
ये 'अब' वो नहीं है...
10 टिप्पणियाँ:
प्रवाहमयी ..अति सुन्दर रचना..
अनुपम शब्द संयोजन .. .उत्कृष्ट लेखन ...
बहुत बढिया!!
वक्त के साथ सब बदल जाता है...बदलना ही पड़ता है.......
मैं समझ गया ये वो नहीं है...
हाँ, ये 'अब' वो नहीं है...दिल को छू गयी ………सच कहा ये 'अब' वो नहीं है
बेहद उम्दा दिलीप ...
इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - सब खबरों के बीच एक खुशखबरी – ब्लॉग बुलेटिन
वाह, इंतजार सी धीरी..बहुत सुन्दर..
वाह बेहद सुन्दर ।
श्रेष्ठ मानवीकरण है,श्रेष्ठ है ब्य्जोक्ति|
नये प्रयोगों की हुई,रचनाओं में प्रयुक्ति||
सच्चाई को खोलना कविता का मकसद है|
इस कसौटी पर रचना अच्छी बेहद है||
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