एक बेंच बूढ़ी सी...

Author: दिलीप /


एक बेंच बूढ़ी सी...
थकी हुई...
बूढ़ी हड्डियाँ उसकी....
कड़कड़ाती हैं अब...
एक हल्की सी छुवन से...
और उसके बगल में वो लैंप पोस्ट...
बूढ़ा सा...
मोतिया हो गया है उसकी आँख में....
रोशनी कम हो गयी है...
आँखों पर कई मरे पतंगों का...
चश्मा लगाता है अब....
खाँसता रहता है उसका बल्ब...
बीमार है थोड़ा...
उसके बगल में एक रिश्ता...
जो कभी उगा था उसी बेंच के सहारे....
अब सूख गया है...
मर जाएगा कुछ दिन में...
बस यादों का इक तना खड़ा रहेगा...
सुना है शहर की सफाई चल रही है...
कल बेंच नयी सी कर दी जाएगी....
लैंप पोस्ट की आँखों का भी इलाज हो जाएगा....
खाँसते बल्ब को बदल दिया जाएगा...
बस एक रिश्ता ही है...
जिसे नया नहीं कर सकते...
वो तो बस काट दिया जाएगा...

5 टिप्पणियाँ:

kshama ने कहा…

बस एक रिश्ता ही है...
जिसे नया नहीं कर सकते...
वो तो बस काट दिया जाएगा...
Yahee zindagee kee asliyat hai.

poonam ने कहा…

umda....bahvpurn

Archana ने कहा…

रिश्ता पुराना हो जाता है
कभी न भूलाने के लिए..
बूढ़ी आँखों में भी सपने तैरते हैं
रिश्तों की याद दिलाने के लिए...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

दिल की कलम से दिल को छूटी हुई!! और क्या कहूँ दिलीप!!

शारदा अरोरा ने कहा…

lamp ki aankho me motiya aur jaalo ka chashma ...bhai vaah

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