काम क्या है आँख से, बहते हुए उन आँसुओं का...

Author: दिलीप /

काम क्या है आँख से, बहते हुए उन आँसुओं का... 
सूख जायें जो टपककर, आग मे तब्दील हो...
 क्या है वो इंसान जिसकी, रूह खुद भटकी हुई हो...
 घर पड़ोसी का जले तो, दिल मे उसके पीर हो
 
है खड़ी नामर्द पीढ़ी, हाथ मे चूड़ी सजाए...
 डमरुओं की थाप पर कोई उन्हे जी भर नचाए...
 खून क्या, पानी भी शायद अब रगों से उड़ गया है...
 हिंद की माटी का मतलब, अब उन्हे कैसे बताए...
 
हिंद की फिर शान ही क्या, जब जवानी हो नशे मे... 
सिर झुकाए घूमती हो, हाथ मे शमशीर हो...

जाने कितने ही खुशी से, फाँसियों पर चढ़ गये थे... 
ऐश और आराम को जो, मार ठोकर बढ़ गये थे... 
एक सुनहरे ख्वाब की, तस्वीर वो दिल मे सजाए... 
वीरता की इक नयी, रोशन कहानी गढ़ गये थे...

उन शहीदों का बड़ा ही, क़र्ज़ है साँसों पे अपनी...
 उनके दिलकश ख्वाब की, टूटी हुई तस्वीर हो...
 
प्यार की असली इबारत, भूल कर हम जी रहे हैं...
 हम हवस मे घोलकर, अपनी जवानी पी रहे हैं...
 जाने कितने दुश्मनो ने घेर के रखा हुआ है...
 हम नशे मे मस्त होकर, खाते सोते जी रहे हैं...

हाथ मे तलवार, आँखों मे हो अंगारे हमारे...
 खींचता दुश्मन कोई, माँ भारती का चीर हो...

कब तलक पालोगे अपनी, आस्तीनों मे सपोले... 
कब तलक जलते रहेंगे, दिल मे यूँ नफ़रत के शोले...
 पीढ़िया पूछेंगी हमसे हिंद जब जलने लगा था...
 तुम तमाशे मे खड़े थे, तब भला तुम क्यूँ बोले...

खून से अब इन्क़लाबी, रंग भर दो आसमाँ मे...
 अब कभी बिगड़ी हुई, इस हिंद की तकदीर हो...

24 टिप्पणियाँ:

Apanatva ने कहा…

क्या है वो इंसान जिसकी, रूह खुद भटकी हुई हो...
घर पड़ोसी का जले तो, दिल मे उसके पीर न हो…
paripathee hai ki kuch panktiya utar kar tareef kee jatee hai par sach maniye mai asmanjas me hoo ki koun see do char panktiya chantoo?

ek ek panktee behatreen soch samajh ka ishthaar hai.......
aabhar.

संजय भास्कर ने कहा…

हाथ मे तलवार, आँखों मे हो अंगारे हमारे...
खींचता दुश्मन कोई, माँ भारती का चीर न हो...
......सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

निवेदिता ने कहा…

अच्छा लिखा है,बस एक ऐतराज़ है ’नामर्द पीढ़ी के साथ चूड़ी’ का जिक्र हज़म नहीं हुआ ! चूडी कमज़ोरी की निशानी नहीं हैं .....आभार !

दिलीप ने कहा…

nivedita ji..bas prachlit lokokti ka upyog kiya tha...varna choodiyon ki shakti se main inkaar nahi karta....

ehsas ने कहा…

कब तलक पालोगे अपनी, आस्तीनों मे सपोले...
कब तलक जलते रहेंगे, दिल मे यूँ नफ़रत के शोले...
पीढ़िया पूछेंगी हमसे हिंद जब जलने लगा था...
तुम तमाशे मे खड़े थे, तब भला तुम क्यूँ न बोले...

इस कविता के माध्यम से आपने एक दर्द को उभारा है। आभार।

Sunil Kumar ने कहा…

क्या है वो इंसान जिसकी, रूह खुद भटकी हुई हो...
घर पड़ोसी का जले तो, दिल मे उसके पीर न हो…
दलीप जी बहुत दिनों बाद आपका ब्लाग देखा |बहुत सुंदर सन्देश देती हुई रचना | हमरी संवेदनशीलता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है बहुत बहुत बधाई

chirag ने कहा…

bahut khoob likh aapane
full of energy

शिवम् मिश्रा ने कहा…

पीढ़िया पूछेंगी हमसे हिंद जब जलने लगा था...
तुम तमाशे मे खड़े थे, तब भला तुम क्यूँ न बोले...

खून से अब इन्क़लाबी, रंग भर दो आसमाँ मे...
अब कभी बिगड़ी हुई, इस हिंद की तकदीर न हो...



वापसी पर स्वागत ... बेहद उम्दा लिखा है ... बस ऐसे ही हम सब को जगाये रखो ...

मनोज कुमार ने कहा…

सशक्त अभिव्यक्ति।

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

पीढ़िया पूछेंगी हमसे हिंद जब जलने लगा था...
तुम तमाशे मे खड़े थे, तब भला तुम क्यूँ न बोले...

dilip ji bahut bahut badhiya post....jo baajhuo k lahu ko garm karne me saksham hai.

Udan Tashtari ने कहा…

खून से अब इन्क़लाबी, रंग भर दो आसमाँ मे...
अब कभी बिगड़ी हुई, इस हिंद की तकदीर न हो...


जबरदस्त आह्वान!! उम्दा रचना...

abhi ने कहा…

जबरदस्त...बेहतरीन लिखा है दिलीप भाई

PADMSINGH ने कहा…

कब तलक पालोगे अपनी, आस्तीनों मे सपोले...
कब तलक जलते रहेंगे, दिल मे यूँ नफ़रत के शोले...
पीढ़िया पूछेंगी हमसे हिंद जब जलने लगा था...
तुम तमाशे मे खड़े थे, तब भला तुम क्यूँ न बोले...

...... अद्भुद... क्या इस रचना के बाद भी गैरत सोती रहेगी

SKT ने कहा…

वाह, दिलीप भाई ...पूरे रंग में हो! लेखनी चरम पर है...बधाई स्वीकारें.

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

सिम्‍पली सुपर्ब

शारदा अरोरा ने कहा…

bade dino bad likha , aapki lekhni me khoon ubalane ki shakti hai ...

Pradeep Kr. Rao ने कहा…

kya baat hai.. bahut khoob .. bahut khoob.. aisa laga jaise shabdon ne shamsheer ka chola pehan liya hai.. aur keh rahi hain ke aao thamo humein aur khade ho jao ranbhoomi mein..!!

PRO. PAWAN K MISHRA ने कहा…

काम क्या है आँख से, बहते हुए उन आँसुओं का...
सूख जायें जो टपककर, आग मे तब्दील न हो...
आँख में आंसू नही खून उतरा

सुमन'मीत' ने कहा…

jaandaar...

sm ने कहा…

nice poem

वन्दना ने कहा…

बेहद सशक्त अभिव्यक्ति।

Patali-The-Village ने कहा…

बेहद सशक्त अभिव्यक्ति। धन्यवाद|

Raam ने कहा…

very nice creation !!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अश्रु बहे तो आग बहे,
मन का जो संवाह बहे।

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